नई दिल्ली । चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी धारा, जिसे वहां यारलुंग त्सांगपो कहा जाता है, पर करीब 60,000 मेगावाट क्षमता की मेडोग जलविद्युत परियोजना विकसित कर रहा है। परियोजना का आकार इसे दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत योजनाओं में शामिल करता है। भारत के लिए चिंता केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि नदी के बहाव, पर्यावरण और भूकंपीय सुरक्षा से जुड़े संभावित प्रभाव भी महत्वपूर्ण हैं। यही नदी अरुणाचल प्रदेश और असम से होकर बांग्लादेश तक जाती है।
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों ने परियोजना को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक और पर्यावरणीय चिंताएं उठाने की जरूरत बताई है। उनके अनुसार, चीन के वैज्ञानिक अध्ययनों में परियोजना क्षेत्र के आसपास सक्रिय पाइझेन फॉल्ट का उल्लेख किया गया है। क्षेत्र की भौगोलिक संरचना को देखते हुए भूकंप, भूस्खलन और चट्टानों के खिसकने जैसे जोखिमों पर निगरानी जरूरी है।
तिब्बत का यह इलाका भूकंपीय गतिविधियों के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। 2017 में निंगची क्षेत्र में आए 6.9 तीव्रता के भूकंप ने भी इस क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता को सामने रखा था। इतने बड़े जलाशय और बांध के निर्माण के कारण किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में संभावित प्रभावों को लेकर भारत में चिंता है। भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती ब्रह्मपुत्र के ऊपरी हिस्से में चीन की बढ़ती जल-नियंत्रण क्षमता है। नदी के बहाव में बड़े बदलाव का असर निचले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता, कृषि और पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है। हालांकि परियोजना के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके संचालन और जल प्रबंधन की जानकारी के बिना करना कठिन है। इसी पृष्ठभूमि में भारत में अरुणाचल प्रदेश की करीब 11,000 मेगावाट क्षमता वाली सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना पर भी चर्चा तेज है। विशेषज्ञों ने उपग्रह, रडार और जलस्तर सेंसर के जरिए ऊपरी ब्रह्मपुत्र क्षेत्र की लगातार निगरानी तथा प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करने की जरूरत बताई है। आने वाले वर्षों में यह परियोजना भारत-चीन संबंधों में जल सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ा अहम मुद्दा बन सकती है।
WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉
Join Now


