द्वापरयुग में महाभारत काल के दौरान पाण्डवों का अज्ञात वास मिला था
देवघर। जिले के सारठ पुराना बाजार में सैंकड़ों वर्ष पूर्व से स्थापित प्राचीन दुर्गा मंदिर इस क्षेत्र में आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस दुर्गा मंदिर के बारे में बताया जाता है कि करीब तीन सौ वर्षों से अधिक समय से यह मंदिर यहां पर स्थापित है। इस मंदिर में तंत्र विद्या के साथ विधिवत पूजा-अर्चना किया जाता है। इस मंदिर के आचार्य पंडित सोमेश्वर झा के अनुसार द्वापरयुग में महाभारत काल के दौरान जब पाण्डवों को अज्ञात वास मिला था।उस समय पाण्डवों के साथ उनकी माता कुंती समेत कई ऋषि मुनि इस मंदिर से करीब पांच किलोमीटर दूर पथरड्डा पहाड़ पर रुके थे। जहां आज भी महाबली भीम के पद चिन्ह, अर्जून के रथ का पहिया आदि का निशान बना हुआ है। इसी दौरान ही पाण्डवों द्वारा मंदिर के रूप में एक कुटिया का निर्माण कर मां दुर्गा की पूजा अर्चना किया गया था।किंवदंती है कि अश्विन मास के शुक्ल पक्ष के शारदीय नवरात्र के समय में ही कुटिया रूपी मंदिर का निर्माण कर पाण्डवों द्वारा पूजा अर्चना किया गया था। इस संबंध में बूढ़े बुजुर्गों द्वारा बताया जाता है कि उस वक्त इस क्षेत्र में घना जंगल था।समय बितता गया काफी समय के बाद एक दिन सारठ के जमींदार स्वर्गीय दरिया लाल को मां भगवती ने स्वपन में उसी स्थान पर मंदिर निर्माण कर विधिवत पूजा अर्चना करने का आदेश दिया।स्वपन मिलने के बाद जमिंदार स्वर्गीय दरिया लाल ने उस स्थान पर मां दुर्गा की मंदिर निर्माण कराया और विद्वान पंडितों द्वारा तांत्रिक विधि विधान से मां दुर्गा की पूजा अर्चना प्रारंभ करवा दिए।धीरे धीरे आस पास के लोगों को मां दुर्गा की प्रति आस्था बढ़ती गई। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण आज से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व सारठ के (घटवाल) जमींदार स्व.दरिया लाल द्वारा किया गया था।तब से लेकर आज तक उनके वंशजों के ठाकुर स्व. श्यामाचरण लाल एवं इनके पुत्र स्व.अभय चरण लाल उर्फ प्यारे लाल एवं उनके भाई स्व. दुलारे लाल के पुत्रों द्वारा प्रत्येक वर्ष दुर्गा पूजा विधि विधान पूर्वक धुमधाम से किया जाता है बताते चलें कि सारठ प्रखंड क्षेत्र में यह एक मात्र दुर्गा मंदिर है जहां पर आज भी तांत्रिक विधि विधान से पूजा अर्चना किया जाता है। इस मंदिर में सरकारी नियमानुसार पूजा एवं मेला आयोजित करने का लाइसेंस भी वर्षों पूर्व से बना हुआ है।हालांकि वर्तमान समय में यह मंदिर चारों तरफ घनी बस्तियों से घिर गया है।जिसके कारण यहां मेले का आयोजन मात्र एक दो घंटे के लिए बहुत छोटे स्तर का होता है।लेकिन पूजा अर्चना करने वाले श्रद्धालुओ भक्तजनों का भीड़ बड़ी संख्या में होती है। दुसरी ओर यह भी बताया जाता है कि इस मंदिर में एक ही वंश के कारीगरों द्वारा मूर्ति बनाने की परम्परा है जो आज भी कायम है। मूर्तिकार गयाराम पाल द्वारा बताया जाता है कि उनके चार पीढियों से इस मंदिर में दुर्गा पूजा के अवसर पर मूर्ति का निर्माण किया जा रहा है।सर्वप्रथम इनके पूर्वज स्वर्गीय हाड़ी राम पाल उसके बाद स्वर्गीय देवेंद्र नाथ पाल, स्वर्गीय सीताराम पाल और वर्तमान में गया राम पाल द्वारा मां दुर्गा की प्रतिमा बनाई जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि आगे भी इसी तरह मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने का कार्य अनवरत जारी रहेगा। वहीं मंदिर के पूजा संचालक सह जमिंदार के वंशज प्रदीप लाल,प्रकाश लाल,प्रेम लाल एवं उनके परिजनों के आलावे अगल बगल गांवों के बड़ी संख्या में भक्तजनों द्वारा बताया कि इस मंदिर में सच्चे मन मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है।इसलिए यह मंदिर दूसरे राज्यों में भी विख्यात है।बता दें कि अन्य राज्यों से भी इस मंदिर में श्रद्धालु भक्तगणों द्वारा अपनी अपनी मन्नत लेकर पहुंचते हैं।और सभी भक्तों पर मां भगवती की असीम कृपा बनी रहती है।


