आरटीआई के तहत मिली जानकारी से हुआ खुलासा- कैबिनेट सचिव से की गई थी शिकायत
नई दिल्ली । भारतीय चुनाव आयोग के भीतर कामकाज के तरीकों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। राइट टू इन्फॉर्मेशन (आरटीआई) के तहत प्राप्त दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के खिलाफ कैबिनेट सचिवालय में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, इस मामले में कैबिनेट सचिवालय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। यह शिकायत वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग (1996 बैच के आईएएस अधिकारी) के खिलाफ थी। दोनों आयुक्तों का आरोप था कि गर्ग ने आयोग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों या संबंधित सदस्यों से बिना किसी चर्चा के ही वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कामकाज के बंटवारे में बदलाव का आदेश जारी कर दिया था। इस बदलाव से मतदाता सूची के आईटी सिस्टम की निगरानी और उसके केंद्रीकरण को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई थी।
कैबिनेट सचिवालय ने क्यों नहीं की कार्रवाई?
बताया गया कि 3 अगस्त की फाइल नोटिंग के मुताबिक, चूंकि ये शिकायतें दोनों चुनाव आयुक्तों ने व्यक्तिगत रूप से भेजी थीं, न कि पूरे चुनाव आयोग (कलेक्टिव बॉडी) की तरफ से, इसलिए इस पर कदम उठाने को संवैधानिक संस्था के आंतरिक कामकाज में हस्तक्षेप माना जा सकता था। यही वजह रही कि शिकायतों पर तत्काल कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई, हालांकि पत्र मिलने की पुष्टि करते हुए उनकी प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय को भी भेज दी गईं।
चुनाव आयोग ने अगले ही दिन पलट दिया था आदेश?
विवाद बढ़ने के बाद, शिकायतों के अगले ही दिन यानी 30 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों ने मिलकर मनीष गर्ग द्वारा किए गए काम के बंटवारे से जुड़े आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही यह निर्देश भी दिया गया कि जब तक आयोग में किसी भी तरह के बदलाव पर आपसी सहमति नहीं बनती, तब तक पुरानी व्यवस्था ही लागू रहेगी।
पहले भी विवादों में रहा है नाम
मनीष गर्ग का नाम इससे पहले भी मतदाता सूची के आईटी सिस्टम के संचालन और अधिकारियों को इसके एक्सेस को मिलने वाले विवादों में आ चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने पहले भी कई निर्वाचन अधिकारियों को सिस्टम का पूरा एक्सेस न मिलने पर सवाल उठाए थे, जिससे वैधानिक कामकाज प्रभावित होने की बात कही गई थी।


