– दुमका फोरम में स्थाई अध्यक्ष का पद खाली
– न्याय की बाट जोह रहे 251 पीड़ित
– प्रभार के भरोसे चल रहा है उपभोक्ता फोरम
– सदस्य नीलमणी मरांडी और वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र बसईवाला ने खोली संसाधनों के अभाव और प्रशासनिक उपेक्षा की पोल
एस. के.झा. ‘सुमन’
दुमका। बाजार के चमकीले विज्ञापनों और ऑनलाइन शॉपिंग के मकड़जाल में जब कोई उपभोक्ता ठगा जाता है, तो न्याय पाने की उसकी आखिरी उम्मीद ‘उपभोक्ता फोरम’ होती है। लेकिन झारखंड की उपराजधानी दुमका में यह उम्मीद प्रशासनिक उपेक्षा और लेटलतीफी के दलदल में फंस चुकी है। हालात यह हैं कि न्याय की आस लेकर चौखट पर पहुंचने वाले उपभोक्ताओं को न्याय की जगह सिर्फ ‘तारीख पर तारीख’ मिल रही है। आंकड़ों के मुताबिक, फोरम में 251 से अधिक मामले सुनवाई के लिए धूल फांक रहे हैं और नियमित अध्यक्ष के अभाव में पूरी व्यवस्था हजारीबाग के जिला उपभोक्ता अध्यक्ष के ‘प्रभार’ में रेंग रही है।
व्यवस्था की इसी बदहाली, संसाधनों के अभाव और न्याय में हो रहे विलंब की परतें खोलने के लिए संताल एक्सप्रेस के इस संवाददाता ने बात की फोरम की महिला सदस्य नीलमणी मरांडी और शहर के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र बसईवाला से। व्यवस्था की लाचारी और पीड़ितों के दर्द को उजागर करती बेबाक बातचीत के प्रमुख अंश।
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अध्यक्ष के इंतजार में न्याय, इंश्योरेंस सेक्टर में सबसे ज्यादा धोखाधड़ी: दुमका उपभोक्ता फोरम की सदस्य नीलमणी मरांडी से खास बातचीत
संवाददाता : दुमका जिला उपभोक्ता फोरम में वर्तमान में कितने मामले लंबित हैं और उनके तेजी से निपटारे के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
नीलमणी मरांडी: फोरम में कुल 251 मामले लंबित हैं, जिनमें 41 फैसले पर हैं। स्थायी अध्यक्ष न होने से थोड़ी देरी है, फिर भी हम त्वरित न्याय हेतु निरंतर प्रयासरत हैं।
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संवाददाता : उपभोक्ता मामलों का निपटारा 90 से 150 दिनों के भीतर होना चाहिए। दुमका में इस समय-सीमा का कितना पालन हो पा रहा है?
नीलमणी मरांडी : नियमित अध्यक्ष और जरूरी कोरम (कम से कम दो सदस्य) के अभाव में इस समय-सीमा का पालन कठिन है। कोरम पूरा न होने से न्याय में देरी हो रही है।
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संवाददाता : डिजिटल इंडिया के दौर में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से ‘ई-जागृति’ पोर्टल के जरिए कितनी शिकायतें आ रही हैं?
नीलमणी मरांडी : अब शत-प्रतिशत मामले ‘ई-जागृति’ पोर्टल से ही दर्ज हो रहे हैं। उपभोक्ता चाहे खुद ऑनलाइन शिकायत करें या फोरम आएं, पंजीकरण इसी डिजिटल माध्यम से होता है।
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संवाददाता : दुमका में सबसे ज्यादा धोखाधड़ी के मामले किस सेक्टर (इंश्योरेंस, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैंकिंग या ऑनलाइन शॉपिंग) से आ रहे हैं?
नीलमणी मरांडी : जिले में सबसे अधिक धोखाधड़ी और विवाद के मामले बीमा सेक्टर से आते हैं। लोग पॉलिसी और दावों को लेकर सबसे ज्यादा फोरम का दरवाजा खटखटाते हैं।
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संवाददाता : उपभोक्ता फोरम में महिलाओं की भागीदारी और उनके मामलों की क्या स्थिति है?
नीलमणी मरांडी : ऑनलाइन शॉपिंग और घरेलू सामानों में धोखाधड़ी को लेकर महिलाओं की शिकायतें तेजी से बढ़ी हैं। हम इनकी समस्याओं को पूरी प्राथमिकता और संवेदनशीलता के साथ सुनते हैं।
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संवाददाता : नए उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत भ्रामक विज्ञापन या घटिया सामान बेचने वालों पर फोरम ने क्या कड़े कदम उठाए हैं?
नीलमणी मरांडी : नए कानून के तहत फोरम सख्त है। उपभोक्ताओं को ठगने वाले भ्रामक विज्ञापनों और घटिया सामान के मामलों में कंपनियों पर कड़े जुर्माने लगाकर पीड़ितों को राहत दी जाती है।
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उपभोक्ता फोरम में क्यों अटकते हैं मामले? जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र बसईवाला से जानें अपने अधिकार और उपभोक्ता कानून की बारीकियाँ
संवाददाता : एक अधिवक्ता के तौर पर आप क्या देखते हैं? उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाते समय आम जनता सबसे बड़ी गलती क्या करती है?
अधिवक्ता राजेंद्र बसईवाला : समय और परिस्थिति के अनुसार मामले के तथ्य बदलते रहते हैं। आज के समय में केवल ‘पक्का बिल’ न होना ही एकमात्र गलती नहीं है। उपभोक्ता फोरम में जाने से पहले विपक्षी को ‘लीगल नोटिस’ न देना, पुख्ता डिजिटल साक्ष्यों की कमी और शिकायत दर्ज कराने की 2 साल की समय-सीमा को गंवा देना, उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी कानूनी चूक साबित होती है।
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संवाददाता : क्या दुमका के उपभोक्ताओं को मानसिक प्रताड़ना और आर्थिक नुकसान के एवज में फोरम से उचित मुआवजा मिल पा रहा है? कोर्ट का रुख कैसा रहता है?*
राजेंद्र बसईवाला : बिल्कुल। दुमका उपभोक्ता फोरम मानसिक और आर्थिक क्षति के मामलों में काफी सख्त है। फोरम कंपनियों या सेवा प्रदाताओं की लापरवाही के खिलाफ उपभोक्ताओं को न सिर्फ न्याय दिला रहा है, बल्कि भारी हर्जाना भी तय कर रहा है। हालांकि, फोरम में स्थायी अध्यक्ष न होने के कारण वर्तमान में कई फैसले अटके हुए हैं। न्याय में थोड़ी देरी जरूर हो सकती है, लेकिन उपभोक्ताओं को उनका पूरा हक मिलेगा।
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संवाददाता : आम जनता में यह भ्रम रहता है कि फोरम में केस लड़ने के लिए भारी-भरकम फीस देकर वकील करना जरूरी है। क्या कोई नागरिक खुद भी अपना केस लड़ सकता है?
राजेंद्र बसईवाला: यह महज़ एक भ्रम है। कोई भी नागरिक बिना वकील के भी खुद अपना केस लड़ सकता है। उपभोक्ता फोरम की प्रक्रिया बेहद सरल और जन-अनुकूल है। यहां आप एक सादे कागज पर भी अपनी शिकायत और तथ्य लिखकर न्याय प्राप्त कर सकते हैं।
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संवाददाता : आजकल ऑनलाइन शॉपिंग फ्रॉड तेजी से बढ़ा है। दुमका जैसे क्षेत्र में कानूनी तौर पर ऐसी कंपनियों को पकड़ना और उपभोक्ता को राहत दिलाना कितना चुनौतीपूर्ण है?
राजेंद्र बसईवाला : तकनीकी सीमितताओं के कारण दुमका जैसे क्षेत्रों में साइबर जालसाजों को पकड़ना वाकई एक बड़ी चुनौती है। ऐसे मामलों में उपभोक्ता की अपनी सतर्कता और घटना के बाद तुरंत की गई कानूनी कार्रवाई ही धोखाधड़ी के खिलाफ हमारा सबसे अचूक हथियार है।
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संवाददाता : अंत में, आम जनता को ठगी से बचने और अपने अधिकारों को पहचानने के लिए आप क्या सलाह देंगे?
राजेंद्र बसईवाला : मेरी साफ सलाह है — सजग रहें, सुरक्षित रहें। किसी भी दस्तावेज़ पर बिना अच्छी तरह पढ़े हस्ताक्षर न करें और लुभावने ऑफ़र के झांसे में बिल्कुल न आएं। अपने कानूनी अधिकारों को पहचानें। यदि धोखाधड़ी हो जाती है, तो घबराएं नहीं, तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 डायल करें या उचित विधिक सहायता लें। आपकी जागरूकता ही आपकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।
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उपभोक्ता फोरम में वर्षवार दर्ज मामलों की सूची
वर्ष कुल मामले
1. 2021 11
2. 2022 62
3. 2023 36
4. 2024 36
5. 2025 18
6. 2026 12 (सितंबर माह तक)
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कुल मामले 251
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251 उपभोक्ताओं की स्थिति की सूची
● उपभोक्ता मामले विचाराधीन – 210
● जजमेंट में मामले – 41
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कुल मामले विचाराधीन – 251
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उपभोक्ता फोरम का हाल: अध्यक्ष न पुरुष सदस्य, सिर्फ एक महिला के भरोसे पूरा सिस्टम
विगत कई वर्षों से उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम भारी स्टाफ संकट से जूझ रहा है। आलम यह है कि नियमित अध्यक्ष और पुरुष सदस्य के बिना ही फोरम का काम चल रहा है।
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वर्तमान में फोरम की स्थिति
● न्यायिक पदों का हाल (कुल 3 पद)
अध्यक्ष: नियमित रिक्त (प्रभार के भरोसे)
पुरुष सदस्य : रिक्त
महिला सदस्या : कार्यरत
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कार्यालयीन स्टाफ की स्थिति
कार्यालय अधीक्षक : रिक्त
निजी सहायक : रिक्त
आशुलिपिक : रिक्त
निम्न वर्गीय लिपिक : 2 पद (दोनों फुल)
बेंच क्लर्क: 1 पद (फुल)
अनुसेवक : 3 पद (2 कार्यरत, 1 रिक्त)
रात्रि प्रहरी: 1 पद (फुल)
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केस स्टडी -1
15 लाख के डेथ क्लेम का फैसला कोरम के अभाव में अटका
टाटा एआईजी बनाम बबली देवी (केस नंबर 46/2022) मामले में 15 लाख रुपये के डेथ क्लेम पर फैसला अटक गया है। न्यायिक पीठ में कोरम पूरा नहीं होने के कारण अंतिम जजमेंट रुका हुआ है। याचिकाकर्ता बबली देवी को न्याय के लिए अब कोरम पूरा होने का इंतजार है।
केस स्टडी – 2
केस स्टडी: मवेशी बीमा क्लेम विवाद
मामला : वर्ष 2024 (केस नंबर 14) में ललिता देवी की गाय की 15 मार्च को दुर्घटना में मौत हो गई। यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस से 60,000 की ‘कैटल पॉलिसी’ होने के बावजूद, मौत दर्ज न होने का बहाना बनाकर क्लेम रोक दिया गया। पीड़िता ने 30,000 मूल भुगतान, हर्जाना और मुकदमेबाजी खर्च समेत कुल 85,000 के दावे के साथ 12 फीसद वार्षिक ब्याज की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ता ललिता देवी को न्याय के लिए अब कोरम पूरा होने का इंतजार है।
केस स्टडी – 3
अमेज़न की लापरवाही: प्रोजेक्टर डिलीवर न करने पर 1.33 लाख का दावा
प्रोजेक्टर (21,490 रुपये) डिलीवर न करने और लीगल नोटिस की अनदेखी पर सलोनी कुमारी ने अमेज़न के खिलाफ 1,33,259 रुपये का मुकदमा दर्ज कराया है। इसमें 1 लाख का हर्जाना, प्रोजेक्टर की कीमत और अन्य कानूनी खर्च शामिल हैं। यह केस उपभोक्ता अधिकारों की सशक्त नज़ीर है। फोरम में कोरम के अभाव में फिलहाल फैसला लंबित है।
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