वह अदालत तक सीमित नहीं थे, वे एक महान समाज सुधारक भी थे
नई दिल्ली । गुलामी के उस दौर में जब भारतीयों को केवल दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता था, तब एक ऐसे भारतीय विद्वान भी थे, जिन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता से ब्रिटिश हुकूमत को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और जो अंग्रेजों के जमाने में हाई कोर्ट में नियुक्त होने वाले पहले भारतीय जज बने। वह थे पंडित शंभूनाथ। 1863 में उनकी नियुक्ति ने अंग्रेजों के उस भ्रम को जड़ से तोड़ दिया जो भारतीय उच्च न्यायिक पदों के योग्य नहीं हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक सन 1820 में कलकत्ता में जन्मे पंडित शंभूनाथ का परिवार मूल रूप से कश्मीर का रहने वाला था। उनके दादा मनसाराम पंडित ने दुर्रानी साम्राज्य के अत्याचारों से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ दी थी और वाराणसी में आकर बस गए थे। उनके पिता शिवप्रसाद बाद में नवाब के दरबार में नौकरी करने लखनऊ गए और फिर कोलकाता आकर बस गए। हालांकि, शंभूनाथ का बचपन स्वास्थ्य समस्याओं के बीच गुजरा। ऐसे में उनका ज्यादातर समय लखनऊ में अपने मामा के घर पर बीता, जहां उन्होंने उर्दू और फारसी भाषाओं का ज्ञान लिया। इसके बाद वो कोलकाता अपने पिता के पास चले गए, जिसके बाद उन्होंने ओरिएंटल सेमिनार में दाखिला लिया, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों और कम उम्र में शादी होने के कारण उन्हें अपनी स्कूली पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
रिपोर्ट के मुताबिक पढ़ाई छूटने के बाद भी उनके हौसले कम नहीं हुए। उन्होंने अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए ‘सदर दीवानी अदालत’ में एक साधारण सहायक रिकॉर्ड कीपर के रूप में काम किया। यहां उनकी उर्दू, फारसी और अंग्रेजी भाषा की शानदार समझ अंग्रेजों के काफी काम आई। शंभूनाथ जिस तरह से अदालती दस्तावेजों का सटीकता से अंग्रेजी में अनुवाद करते थे, ब्रिटिश अधिकारी उनके मुरीद हो गए। इस प्रतिभा के कारण उन्हें जल्द ही डिक्री जारी करने वाले क्लर्क के रूप में पदोन्नत किया गया। इसी दौरान उन्होंने कानून की बारीकियों को बेहद करीब से समझा और औपचारिक डिग्री न होने के बावजूद अपनी मेहनत के दम पर 16 नवंबर 1848 को सदर दीवानी अदालत में वकालत शुरु की।
शंभूनाथ की कानूनी दलीलों और ईमानदारी ने उन्हें जल्द ही देश के सबसे प्रतिष्ठित वकीलों में शुमार कर दिया। 1853 में उन्हें सरकारी वकील नियुक्त किया गया। उनकी योग्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे 1855 से 1857 तक हिंदू कॉलेज के कानून विभाग के पहले भारतीय प्रोफेसर भी रहे। साल 1861 में ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें वरिष्ठ सरकारी वकील बनाया। इसके ठीक एक साल बाद, मुख्य न्यायाधीश सर बार्न्स पीकॉक उनकी कानूनी समझ से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शंभूनाथ के नाम की सिफारिश सीधे उच्च पद के लिए कर दी। इसका असर यह हुआ कि 2 फरवरी 1863 को पंडित शंभूनाथ ने कलकत्ता हाई कोर्ट के पहले भारतीय जज के रूप में शपथ ली।
पंडित शंभूनाथ केवल अदालत तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे एक महान समाज सुधारक भी थे। वे प्रसिद्ध समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर और जॉन इलियट ड्रिंकवाटर बेथून के बेहद करीबी मित्र थे। जब विद्यासागर ने 5 दिसंबर 1855 को देश का पहला ऐतिहासिक विधवा पुनर्विवाह करवाया, तो शंभूनाथ ने भी उनका समर्थन किया। उन्होंने ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई और वे गरीबों की आर्थिक मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे, लेकिन मात्र 46 साल की आयु में 6 जून 1867 को उनका निधन हो गया।


