जयपुर । डिजिटल युग में, जब हम कंप्यूटर, मोबाइल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में जी रहे हैं, यह जानकर हैरानी होती है कि सदियों पहले भी इंसान ने ऐसे असाधारण उपकरण बना लिए थे, जो कई जटिल गणनाएं आसानी से कर सकते थे। 17वीं सदी का एक ऐसा ही अनोखा डिवाइस, जिसे उस दौर का ‘सुपरकंप्यूटर’ कहा जा रहा है, अब दुनिया के सामने फिर से चर्चा में है। यह कोई साधारण उपकरण नहीं, बल्कि विज्ञान, कला और शिल्प का एक अद्भुत संगम है। विशेष बात यह है कि यह ऐतिहासिक एस्ट्रोलैब कभी जयपुर के शाही परिवार का हिस्सा था और बाद में महारानी गायत्री देवी के पास पहुंचा। अब यह अमूल्य धरोहर अंतरराष्ट्रीय नीलामी में जाने वाली है, जहां इसकी कीमत करोड़ों रुपए तक पहुंचने का अनुमान है, जो इसे भारत की समृद्ध वैज्ञानिक विरासत और गौरवशाली इतिहास का एक जीवंत उदाहरण बनाता है।
इस एस्ट्रोलैब का विशाल आकार और वजन इसे और भी अद्वितीय बनाते हैं। इसका वजन करीब 8 किलोग्राम है और इसकी ऊंचाई लगभग 46 सेंटीमीटर है, जो इसे सामान्य एस्ट्रोलैब से कहीं अधिक बड़ा और प्रभावशाली बनाता है। इसमें 94 शहरों के नाम और उनके सटीक अक्षांश-देशांतर अंकित हैं, साथ ही 38 स्टार पॉइंटर्स भी मौजूद हैं। इसकी प्लेट्स इतनी सटीकता से बनाई गई हैं कि उनमें डिग्री को एक-तिहाई तक विभाजित किया गया है, जो उस समय की इंजीनियरिंग और खगोलशास्त्रीय कौशल का अद्भुत उदाहरण है। लंदन में होने वाली इस प्रतिष्ठित नीलामी में इसकी कीमत 1.5 मिलियन से 2.5 मिलियन पाउंड (भारतीय मुद्रा में लगभग 15 से 25 करोड़ रुपए) के बीच रहने का अनुमान है। यह कीमत इसे दुनिया के सबसे महंगे ऐतिहासिक वैज्ञानिक उपकरणों में से एक बना सकती है, और विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी दुर्लभता और ऐतिहासिक महत्व के कारण यह एक नया रिकॉर्ड भी स्थापित कर सकता है। यह एस्ट्रोलैब केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि भारत की महान वैज्ञानिक विरासत और मुगलकालीन विज्ञान की उन्नत समझ का एक शक्तिशाली प्रतीक है।
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