नई दिल्ली । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने 19 साल की युवती को उसके 40 वर्षीय पति के बजाय उसके पार्टनर के साथ रहने का अधिकार दे दिया। इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत युवती के पति द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से हुई थी। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी को अनुज कुमार नामक व्यक्ति ने अवैध रूप से बंधक बना रखा है। पुलिस ने महिला का पता लगाया और उसे वन-स्टॉप सेंटर में रखने के बाद कोर्ट में पेश किया।
यह मामला पति द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी को अनुज कुमार ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से अपने साथ रखे हुए है। पुलिस ने युवती का पता लगाया और उसे कोर्ट में पेश करने से पहले एक वन-स्टॉप सेंटर में रखा, लेकिन जब जजों ने उससे पूछा कि वह क्या चाहती है, तो उसके जवाब में युवती ने अपनी शादी के बारे में बात की, उम्र में 21 साल का फ़र्क के बारे में बताया युवती ने कहा कि वह 19 साल की थी, उसका पति 40 साल का और एक ऐसे रिश्ते के बारे में बताया जिसमें कभी तालमेल नहीं बन पाया। उसने कहा कि शादी ठीक से नहीं चल रही थी और उसने अपने साथ दुर्व्यवहार होने का आरोप भी लगाया।
युवती अपने पार्टनर अनुज के साथ रहना चाहती थी। कोर्ट ने काउंसलिंग का आदेश दिया, ताकि उसे अपने फैसले पर दोबारा सोचने का एक मौका मिल सके, लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदला।
काउंसलिंग सेशन के बाद भी, युवती अपने फैसले पर अड़ी रही। उसके बगल में खड़ा उसका पार्टनर अनुज कुमार ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वह युवती का पूरा ख़्याल रखेगा और उसकी सुरक्षा करेगा। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि सबसे ज़्यादा अहमियत युवती की अपनी आवाज की ही है। एक बार जब यह साफ हो गया कि युवती पर किसी भी तरह का कोई गैर-कानूनी दबाव या रोक-टोक नहीं है, तो पति की याचिका का कोई आधार ही नहीं बचा।
कोर्ट ने महिला को उसके पार्टनर अनुज के साथ जाने की इजाज़त दे दी और इस बात को फिर से दोहराया कि एक बालिग व्यक्ति को यह फैसला करने का पूरा अधिकार है कि वह कहां और किसके साथ रहना चाहता है। मामले को बंद करने से पहले, कोर्ट ने महिला की सुरक्षा के लिए एक और कदम उठाया। अगले छह महीनों तक, कुछ तय अधिकारी जिन्हें शौर्य दीदी कहा जाएगा महिला के संपर्क में रहेंगे, और उसकी सुरक्षा और भलाई का पूरा ध्यान रखेंगे। जरूरी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद युवती को वन-स्टॉप सेंटर से रिहा कर दिया जाएगा। यह मामला भले ही एक कानूनी विवाद के तौर पर शुरू हुआ हो, लेकिन इसका अंत व्यक्तिगत आजादी पर एक मज़बूत संदेश के रूप में हुआ। युवती की बात को सही ठहराते हुए, कोर्ट ने लकीर खींच दी है। जब किसी वयस्क के जीवन की बात आती है, तो अंतिम फैसला उसी व्यक्ति का होता है।
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