चंदन मिश्र
झारखंड के 48 नगर निकाय चुनाव को लेकर प्रचार और जन संपर्क अभियान अपने पूरे रौ पर है। गैर दलीय चुनाव होने के बावजूद सत्ताधारी और विपक्ष के दल अपने अपने समर्थित उम्मीदवारों के लिए दिन रात एक किए हुए हैं। छोटे से बड़े नेता अलग अलग शहरी क्षेत्रों में डेरा डाले हुए हैं। मुख्य विपक्षी दल भाजपा के केंद्रीय पदाधिकारी विशेष तौर पर निकाय चुनाव के लिए झारखंड में कैंप किए हुए हैं। चुनाव को लेकर जीत के दावे और प्रतिदावे किए जा रहे हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण में झारखंड भाजपा के शीर्ष नेता चुनावी व्यवस्था को लेकर कुछ चिंतित और कदाचित भयभीत लग रहे हैं। भाजपा नेता यह भय महज बयानों में प्रकट नहीं कर रहे, बल्कि अपना यह भय राज्य चुनाव आयोग के सामने लिखित रूप से रख भी चुके हैं। प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहु के नेतृत्व में वरिष्ठ पदाधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयुक्त अलका तिवारी से मिलकर उन्हें लिखित पत्र दे चुका है। आज भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी प्रेस के सामने यही आशंका और भय को सामने रखा है।
भाजपा नेताओं ने चुनाव आयुक्त से मांग की है कि सभी मतदान केन्द्रों, स्ट्रांग रूम और मतगणना स्थल पर केंद्रीय सुरक्षा बल की तैनाती करें।
सभी बूथों,मतगणना हॉल और स्ट्रांग रूम में सीसीटीवी कैमरा भी लगाया जाए। भाजपा नेताओं का आरोप है कि राज्य की जनता को राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं है।
पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने आज अपने बयानों के माध्यम से निकाय चुनाव को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवम सांसद आदित्य साहू के नेतृत्व में 13 फरवरी को निर्वाचन आयुक्त को सौंपे गए ज्ञापन की मांग को दोहराया।
आगामी 23 फरवरी को राज्य के 48 नगर निकाय चुनाव क्षेत्रों में मतदान होंगे।लेकिन अभी तक मतदान केंद्रों पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती, सभी मतदान केंद्रों पर सीसीटीवी लगाया जाने का निर्णय नहीं हुआ है।
भाजपा को इस बात की आशंका है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में ईवीएम से चुनाव होने के बावजूद मतदान केंद्रों, स्ट्रॉग रूम और मतगणना केंद्रों पर सीसीटीवी लगाया जाता रहा है। पर निकाय चुनाव को राज्य सरकार ने बैलेट से कराने का निर्णय लिया है जिसमें बड़े पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग और बोगस मतदान से इनकार नहीं किया जा सकता है।
भाजपा का यह भय कितना गहरा और उचित है या नहीं, यह तो राजनीति का विषय हो सकता है। लेकिन देश के अंदर चल रही चुनाव की प्रक्रिया को विपक्षी दल संदेह की नजर से ही देख रहे हैं। देश में हुए आम चुनाव में और तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में वोट चोरी के आरोप देश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने लगाया है। इतना ही नहीं कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची शुद्धिकरण प्रक्रिया में पक्षपात का आरोप लगाते हुए देश के चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला सिर्फ आरोप और प्रत्यारोप तक ही नहीं रहा, बात इससे आगे निकल कर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुकी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो खुद अपनी सरकार का पक्ष लेकर दलीलें देने सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी हैं। इसलिए झारखंड में होनेवाले नगर निकाय चुनाव में मुख्य विपक्षी दल भाजपा को जिस बात का डर सता रहा है, उसे सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता है।
भाजपा के आरोप हैं कि राज्य सरकार निकाय चुनाव कराने के पक्ष में नहीं थी। उच्च न्यायालय के सख्त निर्देश और उनके आंदोलनों के दबाव में राज्य सरकार चुनाव कराने को बाध्य हुई है। विपक्षी दल का यह भी आरोप है कि इसे दलीय आधार पर नहीं कराने के पीछे राज्य सरकार को हार का सता रहा भय ही है। राज्य सरकार बैलेट के माध्यम से चुनाव कराकर पुलिस प्रशासन के माध्यम से चुनाव को अपने समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में प्रभावित करना चाहती है।
विपक्ष की इस आशंका और भाजपा के भय को गंभीरतापूर्वक लेते हुए राज्य में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराना चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन का दायित्व है। संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों को पूरे देश में तभी खारिज किया जा सकता है,जब संस्थाएं निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से चुनाव कार्यों को सम्पन्न कराए।
विपक्ष ने आशंका जताई है कि राज्य में अपराधी बेलगाम हैं,उनका मनोबल सिर चढ़कर बोल रहा है।ऐसे में बिना केंद्रीय बल के देखरेख के निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है।
राज्य में जनता का विश्वास जितना चुनाव जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग को जनता का यह विश्वास जीतना होगा। और यह तभी संभव है जब 48 नगर निकायों में विवादरहित और निष्पक्ष चुनाव हो। जनता को ईमानदारी से अपना जनप्रतिनिधि चुनने और शहर की सरकार बनाने का अवसर मिलना ही चाहिए।
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