■दुमका में आज झामुमो मना रहा है 47 वां झारखंड दिवस समारोह,शिबू सोरेन अमर रहें का गूंजेगा नारा
■ दुमका में पार्टी की स्थापना की याद दिलाने के साथ आदिवासी अस्मिता, सांस्कृतिक गौरव और झामुमो के शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक है 2 फरवरी की रैली
सुमन सिंह
दुमका । झारखंड मुक्ति मोर्चा आज दुमका में 47 वां झारखंड दिवस समारोह मना रहा है।झारखंड आंदोलन के जमाने से हर साल 2 फरवरी को दुमका में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) का स्थापना दिवस के अवसर पर दिशोम गुरु पद्म भूषण शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखंड दिवस मनाया जाता रहा है।इस अवसर पर दुमका में आदिवासियों की बड़ी रैली निकाली जाती है।यह रैली न सिर्फ दुमका में पार्टी की स्थापना की याद दिलाती है, बल्कि आदिवासी अस्मिता, एकता, सांस्कृतिक गौरव और झामुमो के शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक बन चुकी है।
1970 के दशक से दिशोम गुरु शिबू सोरेन के आह्वान पर दुमका के गांधी मैदान में होने वाली रैली में पूरे संताल परगना के कोने-कोने से हजारों की संख्या में आदिवासी जुटते रहे हैं।यह पहली बार है जब 47 वां झारखंड दिवस समारोह में गुरुजी शिबू सोरेन नहीं रहेंगे।हालांकि 2024 में दुमका गांधी मैदान में आयोजित 45 वें और 2025 में 46 वें झारखंड दिवस समारोह में स्वास्थ्य कारणों से गुरुजी दुमका रैली में शामिल नहीं हो सके थे और उनका संदेश पढ़ कर सुनाया गया था।इस बार पहली बार ऐसा होगा जब अमर हो चुके दिशोम गुरु शिबू सोरेन का रैली में संदेश सुनने को नहीं मिलेगा पर उनका अहसास लोग महसूस करेंगे।
झामुमो की स्थापना 4 फरवरी 1973 को धनबाद में हुई थी।कुछ वर्षों बाद ही 2 फरवरी 1978 को दुमका में झामुमो की जिला कमेटी के गठन के अगले वर्ष से दुमका में झामुमो के स्थापना दिवस पर आदिवासियों की रैली की जो परम्परा शुरू की गई,वह झारखंड अलग राज्य बनने के बाद भी जारी रही।ढोल-नगाड़ा, टमाक और डुगडुगी सहित पारम्परिक वाद्य यंत्रों और परम्परागत अस्त्र-शस्त्र तीर-धनुष से लैस आदिवासी स्त्री-पुरूष हजारों की संख्या में रैली में जुटते रहे हैं।शुरुआती वर्षों में शिबू सोरेन के आह्वान पर संताल परगना के दूर-दराज के गांवों से लोग पैदल ही 2 फरवरी की रैली में शामिल होने के लिए दुमका पहुंचते थे।साल दर साल शिबू सोरेन के नेतृत्व में झामुमो की ताकत बढ़ते गई और 2 फरवरी की रैली विशाल होती गई। 1970 और 1980 के दशक में 2 फरवरी की झामुमो की रैली ‘जल,जंगल और जमीन बचाओ’, महाजनों द्वारा आदिवासियों के शोषण और आदिवासियों की हड़पी हुई जमीन की वापसी के लिए संताल परगना में चल रहे आंदोलनों पर केंद्रित थी। उस दौर में दुमका में 2 फरवरी की झामुमो की रैली में आदिवासियों का दिकू द्वारा शोषण के खिलाफ नारे लगते थे।
1980 में शिबू सोरेन दुमका लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित होने के साथ संसदीय राजनीति में प्रवेश कर गए।शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखंड आंदोलन की आवाज सड़क से संसद तक गूंजने लगी।1980 और 1990 के दशक में 2 फरवरी को दुमका में होने वाली झामुमो की रैली अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर उग्र होती चली गई।इसी रैली में झारखंड आंदोलन की दशा और दिशा तय होती थी।2 फरवरी को देर रात कड़ाके की ठंड में सबसे अंत में शिबू सोरेन का भाषण होता था जिसे सुने बिना रैली में जुटे लोग टस से मस नहीं होते थे।गुरुजी के आह्वान का संताल परगना के आदिवासी डुगडुगी बजा कर समर्थन करते थे।
2 फरवरी की रैली में दुमका में गूंजने वाले ‘कैसे लेंगे झारखंड, लड़कर लेंगे झारखंड’ की आवाज दिल्ली तक पहुंची और झारखंड आंदोलन राष्ट्रीय सवाल बन गया।15 नवम्बर 2000 को बिहार से अलग कर झारखंड अलग राज्य अस्तित्व में आया।झारखंड अलग राज्य का सपना पूरा होने के बाद भी 2 फरवरी को झामुमो के स्थापना दिवस पर झारखंड दिवस समारोह मनाने और इस मौके पर बड़ी रैली के आयोजन का सिलसिला जारी रहा।झारखंड बनने से पहले और झारखंड बनने के बाद भी 2 फरवरी की दुमका रैली से झामुमो के राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन होता है। 2 फरवरी को 47 वें झारखंड दिवस समारोह पर हो रही झामुमो की रैली में दिशोम गुरु शिबू सोरेन के संघर्षों की विरासत को आगे बढ़ाने और सोना झारखंड के सपने को पूरा करने का संकल्प लिया जाएगा


