नई दिल्ली । शादी के बाद मात्र 65 दिन साथ रहे पति-पत्नी ने अलग होने के लिए 13 साल कानूनी लड़ाई लड़ी। मामले को सुप्रीम कोर्ट ने सुना और समझा फिर इन पर जुर्माना लगाते हुए कहा कि अदालतों को युद्ध का मैदान न बनाएं। वैवाहिक विवादों में व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वाले जोड़ों को सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने एक ऐसे मामले का निपटारा किया है जिसमें पति-पत्नी शादी के बाद महज 65 दिन साथ रहे, लेकिन पिछले 13 वर्षों से एक-दूसरे के खिलाफ 40 से अधिक मुकदमे लड़ रहे थे। अदालत ने इस स्थिति पर सख्त नाराजगी जताते हुए न केवल दंपती को तलाक दे दिया, बल्कि न्याय व्यवस्था का समय बर्बाद करने के लिए दोनों पक्षों पर 10-10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
इस मामले की शुरुआत जनवरी 2012 में हुई थी, जब दोनों की शादी हुई। विवाह के मात्र दो महीने बाद यानी करीब 65 दिनों के भीतर ही रिश्तों में खटास आ गई। पत्नी ने पति और उसके परिवार पर क्रूरता के आरोप लगाते हुए अपना ससुराल छोड़ दिया और मायके लौट गई। इसके बाद शुरू हुआ मुकदमों का एक अंतहीन सिलसिला, जो अगले 13 सालों तक दिल्ली और उत्तर प्रदेश की विभिन्न अदालतों, हाई कोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इस दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए परिवार अदालतों से लेकर आपराधिक मंचों तक 40 से अधिक केस दर्ज कराए।
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए इसे न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग करार दिया। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, दोनों पक्ष केवल 65 दिन साथ रहे, लेकिन एक दशक से अधिक समय से मुकदमेबाजी में उलझे हैं। उन्होंने अदालतों को अपना युद्धक्षेत्र बना लिया है। ऐसे मामलों में दंड लगाया जाना अनिवार्य है ताकि भविष्य के लिए नजीर पेश की जा सके।अदालत ने दोनों पक्षों पर 10,000 रुपये का प्रतीकात्मक जुर्माना लगाया और इसे सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन में जमा करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए इस विवाह को भंग कर दिया और तलाक को मंजूरी दे दी। कोर्ट ने माना कि शादी पूरी तरह से टूट चुकी है और सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है। अदालत ने एक महत्वपूर्ण आदेश यह भी दिया कि भविष्य में दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ कोई भी नया मामला दर्ज नहीं कर पाएंगे। कोर्ट का मानना था कि अदालतों को व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने का जरिया बनाना स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने इस मामले के जरिए न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ पर भी चिंता व्यक्त की। बेंच ने कहा कि वर्तमान में अदालतें वैवाहिक विवादों और ट्रांसफर याचिकाओं से भरी हुई हैं। अक्सर ये मामले एक-दूसरे को परेशान करने के लिए जवाबी कार्रवाई के रूप में दर्ज किए जाते हैं। जब एक बार आपराधिक मुकदमे शुरू हो जाते हैं, तो पति-पत्नी के बीच पुनर्मिलन की संभावना लगभग खत्म हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि वैवाहिक असहमति की स्थिति में अदालतों का रुख करने से पहले मध्यस्थता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह परिवार के सदस्यों और समाज की भी जिम्मेदारी है कि वे विवाद को कानूनी लड़ाई में बदलने से पहले सुलझाने का प्रयास करें। कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि व्यक्तिगत बदले की भावना के लिए न्याय व्यवस्था को बंधक नहीं बनाया जा सकता।


