सोहराय प्रकृति, पशु और मानव के अटूट बंधन का उत्सव : कुलपति प्रो. (डॉ.) कुनूल कांदीर
कुलपति की बड़ी घोषणा:सोहराय पर्व के जरिए विश्वविद्यालय में बढ़ेगी सांस्कृतिक समरसता

दुमका। सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के दुमका परिसर में स्नातकोत्तर संताली विभाग ने बुधवार को “सोहराय महापर्व एवं संताली भाषा दिवस” का भव्य आयोजन किया। छात्र-छात्राओं के उत्साहपूर्ण सहयोग से सजा यह कार्यक्रम सांस्कृतिक चेतना और आदिवासी विरासत का शानदार प्रदर्शन बना। कार्यक्रम की शुरुआत से पहले नायकी सुनील मुर्मू और आतो मोड़ें होड़ ने गोड टांडी में पारंपरिक पूजा-अर्चना की, जो प्रकृति और मानव के सामंजस्य को दर्शाती है। कार्यक्रम की शुरुआत अमर शहीद सिदो-कान्हू मुर्मू की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन से हुई। मंच संचालन दिलीप कुमार टुडू ने किया।
मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) कुनूल कांदीर ने कहा कि सोहराय पर्व प्रकृति, पशु और मानव के बीच समरसता का प्रतीक है। उन्होंने इसे खुशहाली और संतुलन का उत्सव बताते हुए भविष्य में विश्वविद्यालय स्तर पर सामूहिक रूप से मनाने की घोषणा की। विशिष्ट अतिथि परीक्षा नियंत्रक डॉ. रीना नीलिमा लकड़ा ने सोहराय को आदिवासी समाज की पहचान और आत्मा करार दिया। उन्होंने जोर दिया कि यह पर्व पशुओं के प्रति सम्मान और प्रकृति से जुड़ाव सिखाता है, तथा विश्वविद्यालय का यह आयोजन शिक्षा के साथ संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रमाण है।

विभागाध्यक्ष डॉ. सुशील टुडू ने स्वागत भाषण में सभी का आभार जताया। डॉ. निर्मल मुर्मू ने संताली भाषा की संवैधानिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह ऑस्ट्रिक भाषा परिवार की सबसे बड़ी भाषा है। 22 दिसंबर 2003 को लोकसभा, 23 दिसंबर को राज्यसभा से पारित होकर 7 जनवरी 2004 को राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इसे आठवीं अनुसूची में शामिल किया। एसपी कॉलेज की संताली विभागाध्यक्ष डॉ. होलिका कुमारी मरांडी ने सोहराय के सांस्कृतिक महत्व पर व्याख्यान दिया, जिसमें सामाजिक एकता और परंपराओं की भूमिका पर जोर दिया।
कार्यक्रम में हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार सिन्हा, संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय कुमार मिश्र, अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. पी.पी. सिंह समेत अन्य संकाय प्रमुखों ने विचार साझा किए। पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. शर्मिला सोरेन ने धन्यवाद ज्ञापन में संताली भाषा के चहुंमुखी विकास को गौरवपूर्ण बताया, खासकर देवनागरी लिपि के कारण इसका वैज्ञानिक विस्तार संभव हुआ। इस कार्यक्रम को आनंद हेम्ब्रम, सुनील मुर्मू, आरती टुडू, रोशनराज टुडू, देव मुर्मू, सलबिना टुडू, एलियस मरांडी, सोनू मुर्मू, मुन्ना हांसदा, सुजाता टुडू, पिंकी मुर्मू और मेघाकिरन हांसदा जैसे छात्रों ने इसे सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।


