नई दिल्ली । आगामी वर्ष 2026 भारतीय राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने जा रहा है। एक तरफ जहां कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहीं दूसरी ओर संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है। वर्ष 2026 में राज्यसभा की लगभग 75 सीटें खाली हो रही हैं, जिनके लिए अप्रैल, जून और नवंबर के महीनों में मतदान होना तय है। इन चुनावों के परिणाम न केवल सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के संख्या बल को प्रभावित करेंगे, बल्कि भविष्य के विधायी एजेंडे की दिशा भी तय करेंगे।
राज्यसभा में फिलहाल एनडीए काफी मजबूत स्थिति में है और उसके पास 129 सीटें हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन इंडिया के पास 78 सांसद हैं। 2026 के ये चुनाव शक्ति संतुलन को बदलने का सामर्थ्य रखते हैं। अगले साल जिन प्रमुख राज्यों में सीटें खाली हो रही हैं, उनमें उत्तर प्रदेश की 10 और बिहार की 5 सीटें शामिल हैं। इनके अलावा महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पूर्वोत्तर के कई राज्यों के सांसदों का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है।
सदन से विदा लेने वाले दिग्गजों की सूची काफी लंबी है। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा, वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और शरद पवार जैसे नाम शामिल हैं। वहीं, केंद्रीय मंत्रियों में हरदीप सिंह पुरी, बी.एल. वर्मा, रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कुरियन का कार्यकाल भी पूरा हो रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इनमें से कितने नेताओं को पार्टियां दोबारा मौका देती हैं और कितने नए चेहरों को सदन में प्रवेश मिलता है।
बिहार में अप्रैल 2026 में पांच सीटें रिक्त होंगी। इनमें जेडीयू के हरिवंश नारायण सिंह और रामनाथ ठाकुर, आरजेडी के प्रेम चंद गुप्ता और अमरेंद्र धारी सिंह के साथ-साथ उपेंद्र कुशवाहा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। राज्य के वर्तमान राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए माना जा रहा है कि बीजेपी और जेडीयू अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हैं। महाराष्ट्र की सात सीटों पर भी अप्रैल में चुनाव होने की संभावना है, जहां शरद पवार, प्रियंका चतुर्वेदी और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले जैसे बड़े नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है। नवंबर में उत्तर प्रदेश की 10 सीटों पर होने वाले चुनाव भाजपा के लिए अपनी बढ़त बनाए रखने का बड़ा अवसर होंगे। कुल मिलाकर, 2026 के राज्यसभा चुनाव देश की भावी राजनीति और संसद के भीतर की रणनीतियों में व्यापक बदलाव लाने वाले साबित होंगे। विधानसभा चुनावों के नतीजे भी इन सीटों के चयन और राजनीतिक दलों की भावी रणनीति को काफी हद तक प्रभावित करेंगे।
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