चित्तूर । आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित मशहूर तिरुपति बालाजी मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्री वेंकटेश्वर को समर्पित है। हर साल लाखों श्रद्धालु तिरुपति बालाजी मंदिर दर्शन के लिए आते हैं और अपनी भक्ति का प्रतीक स्वरूप सिर के बाल अर्पित करते हैं। यह परंपरा न केवल विश्वास का प्रतीक है, बल्कि त्याग और समर्पण की भावना का जीवंत उदाहरण भी मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त तिरुपति बालाजी मंदिर में अपने बाल दान करता है, उसे भगवान विष्णु दस गुना अधिक आशीर्वाद और समृद्धि प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि मां लक्ष्मी की विशेष कृपा भी उन भक्तों पर बनी रहती है जो सच्चे मन से यह दान करते हैं। इस अनोखी परंपरा के पीछे कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जिनमें से एक कथा ऋषि भृगु से संबंधित है। कथा के अनुसार, एक बार ऋषि भृगु भगवान विष्णु से मिलने वैकुंठ धाम पहुंचे। भगवान उस समय योगनिद्रा में थे और उन्हें ऋषि के आगमन का आभास नहीं हुआ। ऋषि ने इसे अपमान समझकर क्रोधित होकर भगवान के वक्षस्थल पर पैर से प्रहार कर दिया।
भगवान विष्णु ने क्रोध न करते हुए विनम्रता से ऋषि का पैर पकड़ लिया और कहा “हे मुनिवर, आपके चरण को कहीं चोट तो नहीं लगी?” भगवान की इस विनम्रता ने ऋषि को पश्चाताप से भर दिया और उन्होंने यज्ञ का फल भगवान विष्णु को समर्पित कर दिया। माता लक्ष्मी ने जब यह घटना देखी तो उन्हें भगवान के इस अपमान पर दुख हुआ और वह वैकुंठ छोड़ पृथ्वी पर आ गईं। भगवान विष्णु ने उन्हें खोजने के लिए श्रीनिवास रूप में अवतार लिया। बाद में लक्ष्मी जी ने पद्मावती के रूप में जन्म लिया और दोनों का विवाह हुआ। विवाह के लिए भगवान विष्णु ने कुबेर देव से धन उधार लिया और वचन दिया कि कलियुग के अंत तक वह ऋण चुका देंगे। आज भी भक्त मंदिर में दान देकर इसी ऋण को चुकाने का प्रतीकात्मक प्रयास करते हैं।
बाल दान की परंपरा भी इसी भावना से जुड़ी मानी जाती है। एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान बालाजी की मूर्ति पर चोट लगने से उनके बाल झड़ गए थे। यह देखकर माता नीला देवी ने अपने बाल काटकर भगवान के सिर पर रख दिए। भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि जो भी भक्त सच्चे मन से अपने बाल अर्पित करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। तभी से तिरुपति बालाजी मंदिर में बाल दान की यह प्रथा आरंभ हुई, जो आज भी भक्तों के विश्वास का केंद्र बनी हुई है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां अपने बालों का दान करते हैं। यह सिर्फ एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण और अहंकार त्याग का प्रतीक है।
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