नई दिल्ली । भारत से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब चीन ने फिर चालबाजी की है। चीन ने हाल के वर्षों में सीमा से लगे इलाके में 50 से अधिक गांव बसाए हैं। इन गांवों में रहने के लिए चीनी सरकार लोगों को पैसे देती है, लेकिन बीजिंग का मुख्य उद्देश्य भारत के साथ लगी विवादित सीमा पर आबादी बढ़कर जासूसी करना है। नए गांवों के अलावा चीन ने दूसरे 100 गांवों में नए घर भी बनाए हैं, ताकि और अधिक लोगों को रखा जा सके। रिपोर्ट के अनुसार, चीन बॉर्डर पर गांवों की एक दीवार खड़ी कर रहा है, जो उसके लिए नागरिक चौकी का काम कर रहे हैं। चीन बॉर्डर पर नजर रखने के लिए इस तरीके को तेजी से अपना रहा है।
हिमालय की तलहटी में मौजूद किओंगलिन गांव को चीन ने अभी बसाया है। समुद्रतल से 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह इलाका कभी एक खाली घाटी था। यहां केवल स्थानीय शिकारी ही आते-जाते थे। फिर चीनी अधिकारियों ने घरों और बढ़िया पक्की सड़कों वाला एक गांव बनाया और लोगों को दूसरी बस्तियों से वहां जाने के लिए पैसे दिए गए। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसतरह के लोगों को सीमा रक्षक कहते हैं। किओंगलिन के रहने वाले भारत के सबसे पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश पर चीन की पहली लाइन के चौकीदार हैं। अरुणाचल पर चीन अपना बेबुनियाद दावा करता है। किओंगलिन अकेला गांव नहीं है। हाल के वर्षों में इसतरह के कई निर्माण सामने आए हैं, जो इसका साफ संकेत है कि शी जिनपिंग दूर की सीमाओं के नियंत्रण को मजबूत करने के लिए नागरिक बस्तियों का उपयोग कर रहे हैं। ये वही तरीका है, जो उन्होंने विवादित दक्षिणी चीन सागर में मछली पकड़ने वाले द्वीपों के साथ किया है। सैटेलाइट से हासिल तस्वीरों के विश्लेषण से पता चलता है कि चीन ने भारत की सीमा से लगे लगभग हर हिमालयी दर्रे के पास कम से कम एक गांव बसाया है। इसके साथ ही भूटान और नेपाल की सीमा से लगे अधिकांश दर्रे भी गांव का निर्माण किया है। इन गांवों के बनने से चीन को सड़क, इंटरनेट और बिजली हासिल होती है, जो सीमा पर सैनिकों को जल्दी भेजने में मदद कर सकती है।
आशीष/ईएमएस 11 अगस्त 2024


