डॉ शर्मिला सोरेन
सहायक प्रोफेसर,संताली विभाग, सिदो-कानू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका।
आदिवासियों में कई उपजातियां हैं और सभी जाति के अलग-अलग भाषा संस्कृति है । जीवन जीने के तौर -तरीके भी अलग है। कई आदिवासी खेती पर निर्भर है तो कई जातीय हुनर पर जीविकोपार्जन करते हैं लेकिन इनमें से एक सामान्य यह है की प्राय: सभी आदिवासी प्रकृति पर ही निर्भर होकर जीवन यापन करते हैं। भारतीय संविधान में इन्हें अनुसूचित जनजाति के सूची में रखा गया है। आजादी से पहले आदिवासियों ने बड़े-बड़े आंदोलन किया और अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। लेकिन आजादी के बाद से ही आदिवासियों के पारंपरिक सामाजिक बदलाव और समृद्ध जीवन जीने के तौर तरीके में अनेकों परिवर्तनों के कारण उनकी मजबूत सामाजिक संगठन में कई परिवर्तन हुए। जिससे पारंपरिक जीवन -शैली में भी कई तरह के बदलाव हुए हैं । इन्हीं बदलाव के कारण सामाजिक ताना-बाना में बिखराव उत्पन्न हुई है। उसमें हम दो हमारे दो नसबंदी अन्तर्जातीय विवाह आदि जैसे सरकारी नीतियों ने भी आदिवासियों की जनसंख्या को प्रभावित किया है। पढ़े-लिखे वर्गों में एक या दो बच्चे होना भी एक कारण है, साथ ही सुदूरवर्ती जंगलों में रहना, सड़कों का ना होना, साथ ही स्वास्थ्य सुविधा न होना जनसंख्या को प्रभावित किया है। जिसमें आदिवासियों की नई पीढ़ी दूसरी विचारधारा से प्रभावित होकर पलायन करना और शादी से वंचित होना भी एक ज्वलंत कारण है। जीविकोपार्जन के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करना और वहीं का होकर रह जाना और वहां के सरकार आदिवासियों को आदिवासी ना मानना आदिवासियों की जनसंख्या घटना का बहुत बड़ा कारण माना जा सकता है।


