नई दिल्ली । वैश्विक जल संकट के बीच भारत एक अनोखी तकनीकी पहल के साथ समाधान की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा रहा है। लक्षद्वीप के कवरत्ती द्वीप पर दुनिया का पहला ओटेक आधारित हाइब्रिड डिसेलिनेशन प्लांट तैयार किया जा रहा है, जो समुद्र की लहरों और तापमान के अंतर से एक साथ बिजली और मीठा पानी बनाएगा।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की करीब आधी आबादी साल में कम से कम एक महीने गंभीर जल संकट का सामना करती है और हर चौथा व्यक्ति शुद्ध पेयजल से वंचित है। ऐसे में समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने की तकनीक पर कई देश काम कर रहे हैं, लेकिन भारत का यह प्रयोग उन्हें एक कदम आगे ले जाता है।
यह परियोजना नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी (एनआईओटी) द्वारा विकसित की जा रही है, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत काम करता है। यह प्लांट ओटेक (ओसियन थर्मल एनर्जी कन्वर्सन) तकनीक पर आधारित है, जिसमें समुद्र की सतह के गर्म पानी और गहराई में मौजूद ठंडे पानी के तापमान के अंतर का उपयोग कर ऊर्जा पैदा की जाती है। इस प्रक्रिया के दौरान ही समुद्री पानी को शुद्ध कर पेयजल में बदला जाएगा। इसके लिए करीब 3.8 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जा रही है, जो समुद्र की गहराई (लगभग 1000 मीटर) से ठंडा पानी सतह तक लाएगी।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह दुनिया का पहला ऐसा प्लांट होगा जो 24 घंटे लगातार बिजली उत्पादन और जल शुद्धिकरण दोनों कार्य एक साथ करेगा। इससे पहले लक्षद्वीप के आठ द्वीपों पर एलटीटीडी (लो टेम्परेचर थर्मल डिसलिनेशन) तकनीक के प्लांट काम कर रहे हैं, लेकिन ओटेक आधारित यह हाइब्रिड मॉडल एक बड़ा तकनीकी उन्नयन माना जा रहा है।
लक्षद्वीप जैसे द्वीपों में भूजल स्तर कम होने और खारे पानी की समस्या के कारण पेयजल संकट लंबे समय से बना हुआ है। ऐसे में यह परियोजना स्थानीय लोगों के लिए विश्वसनीय जल स्रोत के साथ-साथ ऊर्जा आपूर्ति का भी स्थायी समाधान बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल होती है, तो यह न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के अन्य तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों के लिए भी एक मिसाल साबित हो सकती है।
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