एस.के.झा.’सुमन’
दुमका। जिले में स्थित बासुकीनाथ धाम देवों के देव महादेव के भक्तों के लिए आस्था का एक महान केंद्र है। विशेषकर पवित्र श्रावणी मेले के दौरान इस पावन धरती की छटा देखते ही बनती है। जब पूरा देश ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठता है, तब बासुकीनाथ धाम में भक्ति, त्याग और विश्वास का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है।
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फौजदारी दरबार: जहां भक्तों की अर्जियां तुरंत सुनी जाती हैं
हिंदू सनातन परंपरा में बाबा बैद्यनाथ (देवघर) को ‘दीवानी न्यायालय’ (सिविल कोर्ट) और बाबा बासुकीनाथ को ‘फौजदारी दरबार’ (क्रिमिनल कोर्ट) माना जाता है। मान्यता है कि देवघर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद जब तक कोई श्रद्धालु बासुकीनाथ आकर बाबा नागेश्वर की पूजा नहीं करता, तब तक उसकी बैद्यनाथ यात्रा अधूरी मानी जाती है। देवघर में भक्त अपनी मन्नतें मांगते हैं, जबकि बासुकीनाथ धाम में आकर बाबा के दरबार में अपनी अर्जी लगाते हैं, जहां भक्तों के दुखों का निपटारा तुरंत होता है।
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कांवड़ियों की कठिन और अनूठी यात्रा
श्रावणी मेले के दौरान सुल्तानगंज (बिहार) से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर लाखों शिवभक्त (कांवड़िए) करीब 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर पहले देवघर पहुंचते हैं। देवघर में जलार्पण करने के बाद श्रद्धालु लगभग 42 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करके बासुकीनाथ धाम आते हैं। गेरुए वस्त्रों में सजे शिवभक्तों की कतारें, उनके पैरों के छाले और उनके चेहरों की थकान बाबा के दर्शन की आस में पल भर में गायब हो जाती है। पूरा मार्ग ‘बोल बम’ के नारों से जीवंत हो उठता है।
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कथा और धार्मिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, बासुकीनाथ मंदिर का इतिहास वासुकी नाग और समुद्र मंथन से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग को ही मथानी की रस्सी बनाया गया था। मंथन के बाद वासुकी नाग के शरीर में जो शिथिलता और जलन पैदा हुई थी, उसे शांत करने के लिए उन्होंने इसी स्थान पर शिव जी की घोर तपस्या की थी। तब भगवान शिव ने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए और यह क्षेत्र ‘बासुकीनाथ’ कहलाया। यहाँ स्थापित शिवलिंग को स्वयं वासुकी नाग द्वारा पूजित माना जाता है।
एक अन्य लोककथा के अनुसार, ‘बासू’ नाम के एक कंदमूल विक्रेता (तपस्वी) को जमीन खोदते समय इस शिवलिंग के दर्शन हुए थे, जिसके बाद इसका नाम बासुकीनाथ पड़ा।
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शिव और शक्ति का अद्भुत मिलन
बासुकीनाथ मंदिर परिसर की एक बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती के मंदिर आमने-सामने हैं। जब शाम की आरती होती है, तो दोनों मंदिरों के कपाट खोल दिए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस समय शिव और शक्ति का मिलन होता है। श्रद्धालुओं के लिए इस अलौकिक दृश्य का साक्षी बनना जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य माना जाता है।
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श्रावणी मेले की भव्यता और आधुनिक व्यवस्थाएं
श्रावणी मेले के दौरान बासुकीनाथ मेला क्षेत्र में सुरक्षा, स्वास्थ्य और सुगमता के कड़े इंतजाम किए जाते हैं।
* सुगम जलार्पण: भक्तों की भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ‘अर्घ्य’ सिस्टम और कतार प्रबंधन की आधुनिक व्यवस्था की जाती है।
* कांवड़िया सेवा: पूरे रास्ते और परिसर में प्रशासन तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा चिकित्सा शिविर, विश्रामालय, और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था की जाती है।
* सांस्कृतिक रंग: संध्या आरती के समय मंदिर परिसर की विद्युत सज्जा और भजन-कीर्तन का माहौल पूरे वातावरण को दिव्य और शाश्वत बना देता है।
बासुकीनाथ का श्रावणी मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता और अटूट श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। यहाँ अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का भेद मिट जाता है और हर कोई बस ‘बाबा का भक्त’ रह जाता है। यदि आप जीवन में शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति के सच्चे स्वरूप का अनुभव करना चाहते हैं, तो श्रावणी मेले के दौरान बासुकीनाथ धाम की यात्रा एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होगी।
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बासुकीनाथ के श्रावणी मेले की महिमा को रेखांकित करता एक आकर्षक और प्रभावशाली प्रारूप नीचे दिया गया है:
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बासुकीनाथ श्रावणी मेला: जहाँ मिटती है हर दूरी, मिलती है आत्मिक शांति
बासुकीनाथ का श्रावणी मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता और अटूट श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है।
यहाँ आते ही अमीर-गरीब और ऊंच-नीच का हर भेद पूरी तरह मिट जाता है। यहाँ न कोई बड़ा है, न कोई छोटा हर कोई बस ‘बाबा का भक्त’ बनकर रह जाता है। गेरुए वस्त्रों में सजे शिवभक्तों का जनसैलाब और ‘बम-बम भोले’ का जयघोष पूरे माहौल को अलौकिक बना देता है।


