●30 जिला प्रभारियों की सूची में केवल एक आदिवासी नेता का नाम
●सवालों के घेरे में संगठन की सामाजिक संतुलन नीति
सुमन सिंह
दुमका। भारतीय जनता पार्टी झारखंड प्रदेश द्वारा जारी जिला प्रभारियों की नई सूची को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के निर्देश पर जारी 30 जिला प्रभारियों की सूची में केवल एक आदिवासी नेता- लातेहार के प्रभारी मनीर उरांव को जगह मिली है। जबकि संताल परगना और कोल्हान जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कई विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं और वहां आदिवासी मतदाता चुनावी समीकरण तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।भाजपा की ओर से जारी सूची में दुमका, साहिबगंज, पाकुड़, गोड्डा, जामताड़ा, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जैसे महत्वपूर्ण जिलों के लिए भी गैर-आदिवासी नेताओं को जिला प्रभारी बनाया गया है। जबकि इन क्षेत्रों की कई लोकसभा और विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं और यहां आदिवासी मतदाता चुनावी परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झारखंड की राजनीति में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। संताल परगना और कोल्हान क्षेत्र में भाजपा पहले भी संगठनात्मक पकड़ मजबूत करने के लिए आदिवासी चेहरों को आगे करती रही है। ऐसे में नई सूची में आदिवासी प्रतिनिधित्व पूरी तरह गायब होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि झारखंड में भाजपा की राजनीति आदिवासी और गैर-आदिवासी नेतृत्व के संतुलन पर आधारित रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और बाबूलाल मरांडी जैसे नेताओं के जरिए पार्टी ने आदिवासी क्षेत्रों में मजबूत आधार बनाया था। लेकिन नई सूची से यह संदेश जा सकता है कि संगठन में आदिवासी नेतृत्व की भागीदारी सीमित हो रही है।


