बिलों पर राष्ट्रपति और राज्यपाल की मंजूरी की डेडलाइन तय करने वाली राज्यों की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा
नई दिल्ली । विधानसभा से पास बिलों पर राष्ट्रपति और राज्यपाल की मंजूरी की डेडलाइन तय करने वाली राज्यों की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार सातवें दिन बुधवार को सुनवाई हुई। जजों ने कहा कि गवर्नर बिलों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और हिमाचल की सरकारों ने विधेयकों को रोककर रखने की विवेकाधिकार शक्ति का विरोध किया। कहा कि कानून बनाना विधानसभा का काम है, इसमें राज्यपालों की कोई भूमिका नहीं है। वे केवल औपचारिक प्रमुख होते हैं। चीफ जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की बेंच ने सुनवाई की।
पश्चिम बंगाल के वकील कपिल सिब्बल ने कहा किअगर विधानसभा से पास बिल गवर्नर को भेजा जाता है, तो उन्हें उस पर हस्ताक्षर करना ही होगा। सिब्बल ने तर्क दिया कि संविधान की धारा-200 में गवर्नर के लिए संतोष (सैटिस्फैक्शन) जैसी कोई शर्त नहीं है। उन्होंने कहा कि या तो वे बिल पर हस्ताक्षर करें, या उसे राष्ट्रपति को भेज दें। लगातार रोके रखना संविधान की भावना के खिलाफ है। अगर गवर्नर मनमर्जी से बिल अटका दें तो यह लोकतंत्र को असंभव बना देगा।
गवर्नरों का कानून बनाने में कोई रोल नहीं
हिमाचल सरकार के वकील आनंद शर्मा ने कहा कि संघीय ढांचा (फेडरलिज्म) भारत की ताकत है और यह संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। अगर गवर्नर बिल रोकेंगे तो इससे केंद्र-राज्य संबंधों में टकराव बढ़ेगा और यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक होगा। गवर्नर का ऑफिस जनता की इच्छा को नकारने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
राज्य में दोहरी सरकार नहीं हो सकती
कर्नाटक सरकार के वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि राज्य में दोहरी सरकार (डायार्की) की व्यवस्था नहीं हो सकती। गवर्नर को हमेशा मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करना होगा।उन्होंने कहा कि संविधान गवर्नर को सिर्फ दो स्थितियों में ही विवेकाधिकार देता है। पहली, जब गवर्नर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजते हैं और दूसरी, जब कोई बिल हाईकोर्ट की शक्तियों को प्रभावित करता है (अनुच्छेद 200 की दूसरी शर्त)। इन दो स्थितियों को छोडक़र गवर्नर के पास कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है।
संसद की तरह ही राज्य विधानमंडल भी संप्रभु
कपिल सिब्बल ने आगे कहा कि संसद संप्रभु है और जनता की इच्छा को तुरंत लागू किया जाना चाहिए। जब कोई विधेयक विधायिका द्वारा पारित किया जाता है तो उसे पूर्ण सांविधानिकता प्राप्त होती है और इसका परीक्षण अदालत में किया जा सकता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य विधेयक का केंद्रीय कानून के संदर्भ में विरोधाभास भी हो सकता है। इस पर सिब्बल ने कहा विधेयक का केंद्रीय कानून के संदर्भ में विरोधाभास होना दुर्लभ मामला है, उस स्थिति में राज्यपाल अपने विवेक का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन राज्यपाल सुपर विधायी निकाय नहीं हो सकते। सिब्बल ने कहा, राज्य विधानमंडल की संप्रभुता भी संसद की संप्रभुता जितनी ही महत्वपूर्ण है। क्या राज्यपाल को इसमें देरी करने की अनुमति दी जानी चाहिए? यह एक अहम सवाल है।


