डॉ०अन्नपूर्णा झा
विभिन्न क्षेत्रों के जनजातीय विद्रोहों में संताल हूल या संतालों का विद्रोह सबसे जबरदस्त और प्रभावपूर्ण था। यह विद्रोह 1855 ई. में आरंभ हुआ जिसका श्रेय भोगनाडीह के निवासी सिदो- कान्हू, चांद-भैरव तथा फूलो-झानो भाई-बहनों को दिया जाता है।
1790 ई. से पूर्व संताल परगना क्षेत्र संतालों का निवास स्थान नहीं था। वे वीरभूम, धालभूम, सिंहभूम, मानभूम तथा बांकुड़ा आदि क्षेत्रों से पलायन कर वहां पहुंचे थे। वह मूल रूप से पहाड़िया जनजाति का निवास स्थान था।1790 ई. से संतालों का इस क्षेत्र में आगमन आरंभ हुआ तथा 1851 ई. तक यहाॅं के एक बड़े भू-भाग में इनके गांव बस गए।
1765 ई. में अंग्रेज़ों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिलने के बाद उनकी रुचि अधिकाधिक राजस्व और अन्य तरीकों से धन कमाने में थी। आम लोगों की सुविधाओं, मूलभूत आवश्यकताओं और परेशानियों की उन्हें कोई परवाह नहीं थी। संताल कई प्रकार से दमन और उत्पीड़न के शिकार थे। न्याय पाने के लिये उन्हें अपने मूल स्थान से काफी दूर देवघर या भागलपुर जाना पड़ता था। अनगिनत परेशानियों, महाजनों के शोषण, सरकार तथा न्यायपालिका के भ्रष्टाचार, पुलिस द्वारा उत्पीड़न और प्रशासनिक उपेक्षा से पीड़ित हजारों संथालों ने एकजुट होकर विद्रोह किया।इस विद्रोह के संबंध में एक तत्कालीन लेखक द्वारा “कलकत्ता रिव्यू ” में एक लेख छापा गया था जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं:
“जमींदार, पुलिस, राजस्व विभाग और अदालतों ने संथालों पर अत्यधिक जुल्म किया।उनकी जमीन -जायदाद छीन ली। हर कदम पर उन्हें अपमानित किया जाता और मारा-पीटा जाता था। उन्हें कर्ज देकर 50 से 500 प्रतिशत तक की दर से ब्याज वसूला जाता था। ताकतवर और धनी लोग अक्सर उनके घरों को उजाड़ देते और उनकी खड़ी फसलों को बर्बाद कर देते थे।ऐसी घटनाएं आम हो चुकी थी। गैर आदिवासी और सरकारी कर्मचारी भी संतालों की नजर में अत्याचारी थे जो संतालों से बेगार कराते थे और उन्हें परेशान करते थे।
1854 ई. आते-आते संतालों में प्रतिरोध आरंभ होने लगा और वे विद्रोह की तैयारी करने लगे। जमींदारों और महाजनों को लूटने की इक्का-दुक्का घटनाओं के बाद 30 जून 1855 को भगनाडीह के 400 आदिवासी गांवों के हजारों आदिवासियों ने एकत्र होकर एक सभा की जिसमें बाहरी लोगों को भगाने, विदेशियों का राज सदा के लिये समाप्त करने तथा अपना राज स्थापित करने के लिये विद्रोह करने का निर्णय लिया गया। विद्रोहियों के प्रमुख नेता सिद्धू- कान्हू द्वारा घोषणा की गई कि ईश्वर ने उन्हें आजादी के लिये हथियार उठाने का निर्देश दिया है। इस घटना के बाद गांवों में जुलूस निकाले जाने लगे साथ ही ढोल और नगाड़े बजाकर संघर्ष का आह्वान किया जाने लगा। जल्द ही 60 हजार हथियारबंद संताल संघर्ष करने के लिए इकट्ठा हो गए। विद्रोह कुछ ही समय में कहलगांव से राजमहल तक के क्षेत्र में फैला गया। विद्रोही संताल महाजनों, जमींदारों तथा गैर आदिवासियों पर हमले के साथ पुलिस स्टेशन,रेलवे स्टेशन और डाक गाड़ियों को जलाने लगे। शोषण के प्रत्येक माध्यम पर हमला किया जाने लगा।
संतालों द्वारा किये गए इस संगठित और व्यापक विद्रोह से सरकार आशंकित हो गयी तथा त्वरित कार्रवाई करते हुए विद्रोहियों से निपटने के लिये सेना का सहारा लिया गया। विद्रोह शीघ्र ही संताल परगना से आगे बढ़ते हुए हजारीबाग, वीरभूम, बांकुड़ा सहित पूरे छोटानागपुर तक फैल गया। सरकार द्वारा विद्रोहियों को कुचलने के लिये एक मेजर जनरल के नेतृत्व में सेना की दस हथियारबंद टुकड़ियां भेजी गयी और सभी उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। इसके साथ ही विद्रोही नेताओं को पकड़ने पर ईनाम घोषित किया गया। सरकार द्वारा बर्बरतापूर्ण कार्रवाई करते हुए विद्रोह को कुचल दिया गया। लगभग 15 हजार से अधिक संथाल मारे गए। उनके अनगिनत गांव उजाड़ लिये गये। अगस्त 1855 में सिदो गिरफ्तार किया गया और तुरंत उसे मार दिया गया। 1856 में कान्हू भी पकड़ा गया इसके साथ ही विद्रोह का अंत हो गया। सरकार ने कठोर कार्रवाई के द्वारा विद्रोह को तात्कालिक रूप से कुचल दिया पर यह समाप्त नहीं हुआ। संतालों का आक्रोश बीच-बीच में प्रकट होता रहा । बाद में उन्होंने 1857 के विद्रोह में खुलकर भाग लिया।
1855 का संताल हूल या संताल विद्रोह मूल रूप से सरकारी उपेक्षा, प्रशासनिक अव्यवस्था तथा गलत नीतियों से उत्पन्न भ्रष्टाचार और अत्याचार के विरुद्ध था। अत्याचारियों को हर कदम पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रशासन का समर्थन, सहयोग और संरक्षण प्राप्त था। जिन विचारों और संकल्पों को आधार बनाकर तथा जिन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संथालों ने 1855 ई. में सशस्त्र विद्रोह किया था वे आज भी प्रासंगिक होने के साथ उतने ही महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि 21 वीं सदी के तीसरे दशक में 26 वर्षीय युवा झारखंड में आज भी उच्च शिक्षा, नशामुक्ति, बाल-विवाह,डायन प्रथा, महिला सशक्तिकरण,वृद्ध और दिव्यांगजन जैसी समस्या का सामना कर रहा है,आवश्यक है उन्हें पुनः सोचने समझने और उनपर अमल करने की ताकि झारखंड में एक स्वस्थ वातावरण और जागरूक समाज की स्थापना हो।
इतिहास विभाग,
डिग्री कॉलेज मनोहरपुर, कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा।


