– अशोक सिंह
झारखंड स्वायत्तता और सुशासन का अगुआ रहा है। यहां की धरती प्रतिरोध की धरती रही है। जब भी यहां शोषण, दमन व अत्याचार हुआ है यहां के आदिवासियों ने गोलबंद होकर उसका सामना किया है। संताल हूल से लेकर बिरसा उलगुलान तक और नेतरहाट फिल्ड फायरिंग रेंज आंदोलन से लेकर कोयलकारो आंदोलन तक का इतिहास इसका बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण रहा है।
बात संताल परगना क्षेत्र के संताल हूल की करें तो 19वीं सदी के मध्य दशक में दामिन ए कोह के संताल समुदाय सहित अन्य पिछड़े व शोषित समुदायों का जो दमन, शोषण व अत्याचार साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन तंत्र और जमींदारों, महाजनों साहूकारों के गंठजोर ने किया, उसी का व्यापक और ऐतिहासिक परिणाम था 1855 का संताल हूल।
हूल इतना विशाल और व्यापक था कि उसकी श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया वर्तमान साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गांव से लेकर भागलपुर और पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले तक में उग्रतम रूप में देखी गई थी। ऐसे में इतने बड़े और व्यापक सशस्त्र विद्रोह के सुचारू संचालन के लिए ब्रिटिश शासन से शोषित, उत्पीड़ित, अपेक्षित समस्त समुदायों को एकजुट व एकसूत्र में बांधने की आवश्यकता थी। शायद इसलिए वर्ण और जाति वर्ग भेद भूलकर सभी समुदाय इसके लिए एकजुट हुए थे और मिलकर संघर्ष किया था। बावजूद इतिहासकारों ने विद्रोह की व्यापकता व तीव्रता को सीमित करते हुए इसे संताल विद्रोह की संज्ञा दी। जबकि इस संताल हूल के दो वर्ष बाद 1857 में हुए सिपाही विद्रोह को इतिहासकारों ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में स्थापित कर दिया। आदिवासी दृष्टि से देखें समझें तो आदिवासी समुदाय के संघर्ष और उनकी अस्मिता की इससे अधिक और घोर उपेक्षा क्या हो सकती है! क्या इसे उनके इतिहास के साथ हुआ छल व षड्यंत्र नहीं कहा जा सकता!
1855 के संताल हूल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर एक नजर डाले तो संक्षेप में हम कह सकते हैं कि एक लंबे अरसे से जमींदारों सूदखोर महाजनों और ब्रिटिश हुकूमत के शोषण दमन के खिलाफ संतालों के मन में सुलग रही असंतोष की आग एकाएक क्रांति के रूप में भड़क उठी, जिसका नेतृत्व साहेबगंज भोगनाहीह के सिद्धू कान्हू चांद, भैरव नामक चार भाइयों ने किया था, जिसमें उनकी दो बहनों फूलो झानो की भी बड़ी भूमिका रही थी।
कहा जाता है सिद्धू कान्हू ने अपने आंदोलन को जन आंदोलन बनाने के लिए तत्काल धार्मिक भावनाओं का सहारा लेते हुए संतालों को यह संदेश दिया था कि ईश्वर ने उन्हें संतालों को संगठित कर अत्याचारों का अंत करते हुए अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का आदेश दिया है। फिर क्या था 30 जून को सिद्धू कान्हू के आह्वान पर लगभग 400 गांवों के 10,000 संताल आदिवासी भोगनाडी में एकत्रित हुए और जमींदारों, महाजनों व ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का सामूहिक संकल्प लिया।
सिद्धू कान्हू के नेतृत्व में संताल क्रांतिकारियों ने बंगाल और पछियारी महाजनों को खदेड़ डालने और उस क्षेत्र को अपने अधिकार में करके, अपना राज्य कायम करने के निश्चय की घोषणा तो कर डाली परंतु कुम्हार, लोहार, तेली, मोनिम व दलित जातियों के लोगों, जो अनेक प्रकार से उनके सहायक थे, उन सबों को अपने प्रतिरोध की भावना से अलग रखा। साथ ही सभी वर्गों को एकजुट कर अपने संगठन को और मजबूत किया।
भोगनाडीह की सभा के बाद क्रांतिकारियों ने अपना अभियान आरंभ किया और एक रणनीति के तहत संघर्ष के लिए सामूहिक रूप से उठ खड़े हुए। देखते ही देखते सिद्धू कान्हू के नेतृत्व में यह विद्रोह काफी व्यापक पैमाने पर फैल गया और वर्ग संघर्ष का रूप ले लिया। दूसरी तरफ जमींदारों और महाजनों ने विद्रोह को कुचलना के लिए ब्रिटिश हुकूमत का साथ दिया। फलस्वरुप संताल परगना से लेकर भागलपुर और बीरभूम तक के विभिन्न क्षेत्रों में विद्रोह का स्वरूप काफी भयानक व व्यापक हो गया।
जुलाई 1855 को लगभग 4,000 विद्रोहियों ने अंग्रेजी फौज के साथ भयंकर युद्ध किया, जिसमे संताल नेतृत्वकर्ता सहित कई क्रांतिकारी नेता घायल हुए और लगभग 200 से अधिक आदिवासी मारे गए। लगभग एक सप्ताह बाद पुनः संघर्ष शुरू हुआ और क्रांतिकारियों ने पुलिस, महाजन और जमींदारों की सम्मिलित सेना को पराजित किया। इस व्यापक विद्रोह और उसकी तीव्रता को देखते हुए तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर ने सैनिक कार्रवाई के द्वारा विद्रोहियों के सैकड़ों गांवों को नष्ट कर दिया और सिद्धू कान्हू को अलग-अलग जगहों पर सार्वजनिक रूप से हजारों क्रांतिकारियों के समाने फांसी दे दी गई। तथा चांद भैरव सहित अन्य क्रांतिकारी संघर्ष करते हुई वीरगति को प्राप्त हो गए।
अंग्रेजी सरकार ने अपनी सैन्य शक्ति व कूटनीति से फूट डालो और शासन करो की नीति के बल पर उक्त सशस्त्र क्रांति का दमन तो कर दिया परंतु स्वतंत्रता की आग भीतर ही भीतर सुलग रही थी, जो आगे चलकर संताल परगना में सफा होड़ अर्थात सुधारवादी संतालों के अहिंसक आंदोलन के रूप में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा के साथ मिलकर संघर्ष में शामिल हो गई।
स्पष्ट है कि संतालों के नेतृत्व वाली उक्त सशस्त्र क्रांति का स्वरूप राष्ट्रीय और ब्रिटिश शासन विरोधी था। यद्यपि अंग्रेज सरकार की कूटनीति के परिप्रेक्ष्य में उसे मुख्यतः गैर संताल विरोधी करार दिए जाने का प्रयास किया जाता रहा, जो आदिवासी इतिहास के साथ किया गया षड्यंत्र ही कहा जा सकता है।
साम्यवादी लेखक कार्ल मार्क्स ने अपनी भारत संबंधित टिप्पणी में 1855 के संताल विद्रोह की चर्चा करते हुए लिखा है कि सत्ता शासन के लिए होने वाले युद्धों से अलग यह अपने तरह का एक ऐसा पहला संगठित जनयुद्ध था, जिसमें सिपाहियों के बदले आम लोगों ने हिस्सा लिया था। एक ओर अंग्रेज सैनिकों की बंदूकें व तोपें थी तो दूसरी ओर बुलंद हौसले के साथ पारंपरिक हथियार लिए संताल आदिवासी थे। भारतवर्ष के इतिहास में ब्रिटिश शासन के लिए 1855 की लड़ाई कई मायनों में अहम रही थी। अपने अधिकारों के लिए लड़े गए संघर्ष की मूल भावना को ब्रिटिश शासन ने समझा और तब जाकर उन्हें अपने गांव व सीमा क्षेत्र के अंदर अपने पारंपरिक तरीके से रहने का अधिकार देते हुए, इस क्षेत्र के लिए विशेष कानून बनाया।
संताल हूल को संताल विद्रोह कहते ही इसकी परिभाषा खोखली हो जाती है। क्योंकि वास्तव में यह सिर्फ अंग्रेजों के विरुद्ध एक विद्रोह मात्र नहीं बल्कि सार्वभौमिकता एवं अस्तित्व को बचाने के लिए अधिकार पूर्ण संघर्ष था। वर्ग संघर्ष का एक ऐसा स्वरूप जिसके कारण संताल परगना क्षेत्र को राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकार मिला। इस पूरे वर्ग संघर्ष को संताल विद्रोह न मानकर सिर्फ हूल ही कहा जाना चाहिए। इस हूल का महत्वपूर्ण तत्व जहाँ एक ओर प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन था वहीं दूसरी ओर विविधता और विभिन्नता को बरकरार रखना भी था। साथ ही श्रम को केंद्रीय तत्व मानकर समुदाय और समाज को सबल बनाना भी था लेकिन हूल के इतने वर्षों बाद भी यह हो न सका और हुआ यह कि विकास की नीति परंपरागत जरूरतों के अनुरूप नहीं बनाए गए। आदिवासियों को उस बाजार के हवाले कर दिया गया, जिसका आधार ही मोलतोल है। जबकि यह तो सब जानते हैं कि आदिवासी परंपरा और उनके जीवन व्यवहार में मोलतोल का कोई स्थान नहीं है। जब से नई आर्थिक नीति आई है बाजार का हमलाकारी रूख आदिवासी समाज पर है। आदिवासियों की विरासतों के साथ ज्यादा खेल किया जा रहा है और यह बताने की कोशिश की जा रही है कि आदिवासी समाज अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकता। आदिवासी क्षेत्र के संसाधनों को लूटने की नीयत से इतिहास के मिथकों की रचना की जा रही है और आदिवासियों की सामाजिकता को व्यक्तिवाद में बदलने की साजिश की जा रही है। आदिवासी जिस तरह जंगल और जमीन के बिना खानाबदोश हो जाते हैं उसी तरह वह अपने ऐतिहासिक प्रतीकों से कट कर सदा के लिए खत्म हो जाता है। दुनिया के कुछ कथित विकसित देशों में यह देखा जा सकता है। यही कारण है कि आज का आदिवासी समाज अपनी परंपरा को ज्यादा याद करता है और उन हमलों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहता है, जिसने उसकी सामूहिकता को ही नष्ट कर दिया है या करने का तरीका ईजाद कर दिया है। आदिवासी जन राजनीति की बुनियाद उस जनतंत्र की स्थापना है, जिसमें व्यक्ति से ज्यादा समूह का स्थान होगा। इसे स्थापित करने के लिए आदिवासियों को अपनी उस इतिहास चेतना को फिर से स्थापित करना होगा जो कि उपनिवेशकालीन और बाद में आंतरिक उपनिवेशवादी संस्कृतिकरण के शिकार हो गए हैं।
आदिवासी समाज के विकास और राजनीति के सामने अनेक गंभीर सवाल हैं झारखण्ड की अब तक की विविधता को उसे बचाना है तो दूसरी और उसे यह भी साबित करना है कि आज की नैतिकता की तुलना में उनकी सामाजिक नैतिकता कहीं ज्यादा कारगर है। ऐसे में किसी भी समाज की पहचान उनके अवयवों के अस्तित्व के आधार पर होती है और उसके लिए आवश्यक है उस समाज में सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का जागृत होना। बदलते राजनीतिक सामाजिक परिदृश्य में यह आवश्यक हो जाता है कि परंपरागत स्वशासन की पद्धति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखते हुए परिभाषित किया जाए। हूल की सार्थकता भी इसी में निहित है और
यह तभी संभव है जब हम वैकल्पिक को सिर्फ वैकल्पिक न माने बल्कि उसे धरातल से उपजा हुआ यथार्थ मानकर सांस्कृतिक चेतना के साथ प्रतिरोध का स्वर मुखर करें। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हूल मात्र एक विद्रोह नहीं, एक दर्शन है। यह सिर्फ सिद्धांत नहीं, अस्तित्व की प्रमाणिकता के लिए सामूहिक संघर्ष का प्रतिफल व समाज की व्यावहारिकता है। स्वशासन स्वावलंबन और स्वाभिमान के वजूद की रक्षा के लिए हूल के उक्त दार्शनिक सिद्धांत के बिना न तो समतामूलक समाज की स्थापना की जा सकती और न ही हूल की मूल अवधारणा को समग्रता में समझा जा सकता है।
कुल मिलाकर निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि वर्तमान समय में हूल की प्रासंगिकता को समझने की बात करें तो वर्तमान समय में हूल की प्रासंगिकता को समझने से पहले आदिवासी समाज के विकास की उस मूल अवधारणा को समझना होगा जिसमें आदिवासी की रक्षा के लिए सामूहिक संघर्ष की लम्बी परंपरा रही है। आदिवासी अस्मिता और विकास की मूल अवधारणा इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें सांस्कृतिक चेतना के साथ प्रतिरोध का स्वर कितना मुखर व प्रखर रहा है। आदिवासी समाज में सांस्कृतिक चेतना के साथ प्रतिरोध की वह मुखरता व प्रखरता उनके उस स्वायत्तता, स्वशासन और स्वाभिमान के वजूद की रक्षा से जुड़ा है, जिसमें अबुआ दिसोम, अबुआ राज का सपना कभी सिद्धू कान्हू ने देखा था और 1855 के अपने उस संताल हूल के माध्यम से साकार किया था। वह सपना जो सिर्फ सिद्धू कान्हू का सपना नहीं था, बल्कि संताल हूल से जुड़े उन हजारों लाखों आदिवासियों का सपना था, जो अपने हक अधिकार और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए उसमें शहीद हो गए थे लेकिन अफसोस कि संताल हूल और आजादी के साथ साथ झारखंड राज्य की स्थापना के इतने वर्षों बाद भी आज आदिवासी समाज अपने बराबरी वाले समाजतंत्र के लिए संघर्ष कर रहा है। खासकर विकास के सवाल को लेकर वह वर्तमान सामाजिक राजनीतिक विसंगतियों और उसके तौर तरीके के खिलाफ आवाज उठा रहा है। विशेषकर उनके खिलाफ जो इतिहास की आदिवासी अवधारणा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और आदिवासी पहचान के सवाल को हमेशा दरकिनार करते रहे है।
गौरतलब है कि अंग्रेज इतिहासकारों ने तो आदिवासी इतिहास की बुनियाद को बदल ही दिया। मानव शास्त्रियों की भी बात करें तो उनके अध्ययन में भी देशज बोध का अभाव रहा है। वर्तमान राजनीतिज्ञ भी अपने सतही इतिहास बोध की वजह से संताल हूल की मूल अवधारणा को समझ नहीं पा रहे हैं। ऐसे में हूल की वर्तमान प्रासंगिकता, आदिवासियों की आदिवासीयत और उसके पीछे के उसकी दार्शनिकता को केवल उसकी मौखिक परंपरा व स्वशासन की देशज ज्ञान परंपरा के आधार पर ही आदिवासी जनतंत्र की निरंतरता को समझा जा सकता है और यह आधे अधूरे सतही देशज ज्ञान से संभव नहीं है। इसके लिए आदिवासीयत बोध व वैज्ञानिक दृष्टिकोण चाहिए, जिसका आज हमारे आधुनिक समाज में ही नहीं बल्कि राजनीतिज्ञों में भी घोर अभाव है।
सम्पर्क: जनमत शोध संस्थान,
पुराना दुमका केवट पाड़ा


