आज भी जीवंत सिदो-कान्हू की क्रांतिकारी चेतना*
कुमार कृष्णन
जब पूरा देश महान संथाल हूल की 171वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब यह अवसर उन अमर वीरों—सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू, भैरव मुर्मू, फूलो मुर्मू, झानो मुर्मू तथा उन हजारों अनाम स्त्री-पुरुषों—को श्रद्धापूर्वक नमन करने का है, जिन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध अपने प्राणों की आहुति देकर इतिहास की एक अमिट गाथा लिखी।
30 जून 1855 को वर्तमान झारखंड के भोगनाडीह गांव से आरंभ हुआ संथाल हूल केवल एक आदिवासी विद्रोह नहीं था। यह अन्याय, दमन और शोषण के विरुद्ध स्वाभिमान, आत्मसम्मान और स्वतंत्र अस्तित्व की उद्घोषणा थी। अंग्रेजी राज की दमनकारी भू-राजस्व व्यवस्था, महाजनों की सूदखोरी और जमींदारी शोषण के विरुद्ध उठी यह जनलहर भारतीय इतिहास के सबसे बड़े जनआंदोलनों में से एक मानी जाती है। इतिहासकार भले ही इसे भारत का पहला औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलन कहने पर अलग-अलग मत रखते हों, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सबसे प्रारंभिक और व्यापक जनविद्रोहों में से एक था।
लगभग डेढ़ शताब्दी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी संथाल हूल केवल इतिहास का अध्याय नहीं है; वह न्याय, समानता, आदिवासी अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी की निरंतर प्रेरणा बना हुआ है। यह हमें याद दिलाता है कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।
शोषण के विरुद्ध उठी स्वाभिमान की आवाज़
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक वर्तमान झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के वनांचलों में रहने वाला संथाल समाज गहरे आर्थिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा था। अंग्रेजी शासन की नई भूमि व्यवस्था ने उनकी पारंपरिक सामुदायिक जीवन-पद्धति को तोड़ दिया। महाजन, साहूकार और जमींदार कर्ज के जाल में फंसाकर उनकी जमीनें हड़पने लगे। खेती उजड़ने लगी, बेगार बढ़ी और सदियों से अपनी धरती पर स्वतंत्र जीवन जीने वाला समाज धीरे-धीरे विस्थापन और अपमान का शिकार होने लगा।
ऐसे कठिन समय में सिदो और कान्हू के नेतृत्व में चांद, भैरव, फूलो, झानो तथा हजारों साधारण संथाल स्त्री-पुरुष एकजुट हुए। उन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं, बल्कि समाज की अस्मिता, सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष का बिगुल फूंका।
संथाल हूल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह किसी राजा, रियासत या साम्राज्य का युद्ध नहीं था। यह किसानों, श्रमिकों, शिकारियों, कारीगरों, महिलाओं और ग्रामीण समुदाय का सामूहिक आंदोलन था।
इस संघर्ष में फूलो और झानो मुर्मू की भूमिका भारतीय इतिहास में महिला साहस का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान की लड़ाई केवल पुरुषों की नहीं होती। उन्होंने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने समाज, अपनी धरती और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
हूल की ज्वाला शीघ्र ही सैकड़ों गांवों तक फैल गई। अंग्रेजी सत्ता ने इसे कुचलने के लिए भारी सैन्य बल का प्रयोग किया। हजारों लोग शहीद हुए, अनेक गांव उजाड़ दिए गए और अंततः 1856 की शुरुआत तक इस विद्रोह को दबा दिया गया। किंतु विचारों की पराजय कभी नहीं हुई। सैन्य हार के बावजूद हूल नैतिक विजय का प्रतीक बन गया।
हूल की ऐतिहासिक उपलब्धियां
संथाल हूल को भले ही तत्कालीन शासन ने बलपूर्वक दबा दिया, लेकिन इसने ब्रिटिश प्रशासन को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया। आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन में सुधार किए गए और आगे चलकर संथाल परगना को एक विशिष्ट प्रशासनिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया गया, ताकि वहां के लोगों की समस्याओं का अलग ढंग से समाधान किया जा सके।
इस आंदोलन ने यह भी सिद्ध कर दिया कि समाज का सबसे वंचित वर्ग भी संगठित होकर साम्राज्यवादी सत्ता को चुनौती दे सकता है। यही कारण है कि संथाल हूल को भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की प्रारंभिक जनधाराओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
स्वतंत्र भारत के संविधान ने अनुसूचित जनजातियों को विशेष संरक्षण दिया। पाँचवीं अनुसूची, वनाधिकार कानून, पेसा कानून तथा अनुसूचित क्षेत्रों की विशेष व्यवस्थाएं आदिवासी अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से बनाई गईं। झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों का गठन भी लंबे जनसंघर्षों का परिणाम था।
फिर भी वास्तविकता यह है कि आज भी अनेक आदिवासी समुदाय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पोषण और आधारभूत सुविधाओं के मामले में पिछड़े हुए हैं। विस्थापन, भूमि अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जैसे प्रश्न आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
इसीलिए संथाल हूल आज भी हमसे एक मूल प्रश्न पूछता है—विकास किसके लिए है, और विकास की प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भागीदारी कितनी सुनिश्चित है?
जल, जंगल और जमीन का दर्शन
संथाल समाज के लिए जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, आस्था और जीवन का आधार हैं। जंगल उनके लिए आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि उनकी स्मृतियों, परंपराओं और आध्यात्मिक जीवन का केंद्र है।
आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं, तब संथाल समाज का प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।
विकास तभी सार्थक होगा, जब उसमें पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक न्याय और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान समान रूप से शामिल होगा।
इतिहास से वर्तमान तक
आज अनेक विद्वान और सामाजिक चिंतक औपनिवेशिक काल के संसाधन दोहन और वर्तमान समय की कुछ विकास संबंधी चुनौतियों के बीच समानताओं पर चर्चा करते हैं। वहीं यह भी सत्य है कि स्वतंत्र भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहां संविधान, न्यायपालिका और जनभागीदारी के माध्यम से नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।
इसलिए संथाल हूल का सबसे बड़ा संदेश विकास का विरोध नहीं, बल्कि ऐसे विकास का समर्थन है जिसमें न्याय, सम्मान, पारदर्शिता और सहभागिता सुनिश्चित हो।
विरासत का संरक्षण हमारी जिम्मेदारी
संथाल हूल आज भी केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं, बल्कि लोकगीतों, लोककथाओं, सांस्कृतिक उत्सवों और सामूहिक स्मृतियों में जीवित है। प्रत्येक वर्ष हूल दिवस केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपने इतिहास और पूर्वजों के संघर्ष से परिचित कराने का भी पर्व है।
विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, संग्रहालयों और सांस्कृतिक संगठनों का दायित्व है कि वे संथाली भाषा, लोकगीतों और मौखिक परंपराओं का संरक्षण करें। इनका दस्तावेजीकरण, अनुवाद और डिजिटल अभिलेखीकरण भविष्य की पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर सिद्ध होगा।
एक अमर प्रेरणा
संथाल हूल केवल संथाल समाज की विरासत नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना की अमूल्य धरोहर है। यह हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ न्याय है, सम्मान है और समान अवसर है।
सिदो, कान्हू, चांद, भैरव, फूलो, झानो और हजारों अनाम शहीदों का बलिदान आज भी हमें प्रेरित करता है कि हम ऐसा भारत बनाएं, जहां विकास समावेशी हो, प्रकृति सुरक्षित हो, आदिवासी संस्कृति सम्मानित हो और समाज का अंतिम व्यक्ति भी न्याय का अधिकार पा सके। संथाल हूल अतीत की केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि साहस, एकता और स्वाभिमान का वह शाश्वत संदेश है, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा। यही उन अमर शहीदों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


