अशोक कुमार
यह पुरानी देहाती कहावत है कि घर फूटे तो गंवार लूटे। यह कहावत आज पूरी तरह लालू परिवार पर लागू हो रही है। सच्चाई यह है कि चुनाव पूर्व ही लालू परिवार में अंदर ही अंदर विद्रोह की चिंगारी सुलग रही थी। विद्रोह का झंडा उनके बड़े बेटे तेज प्रताप ने तो पहने ही उठा लिया था और राजद के समानान्तर जन शक्ति जनता दलअपनी पार्टी बनाकर और चुनाव में अपनी पार्टी का उम्मीदवार खड़ा कर दे दिया था।सचमुच उन्होंने विभीषण का रोल अदा कर अप्रत्यक्ष रूप से राजग गठबंधन को सपोर्ट किया । घर का भेदी लंका ढाहे का कहावट भी यहां चरितार्थ हुआ। बड़े बुजुर्ग ठीक ही कहते हैं कि परिवार में कलह होने से घर की लक्ष्मी चली जाती है। लालू परिवार में कलह होने का असर लक्ष्मी के साथ साथ राजद की राजनीति पर भी पडऩा तय है। परिवार पर तो पहले से ही संकट आया हुआ है लैंड फोर जॉब मामले को लेकर। कोर्ट में इस मामले को लेकर केस खुल चुका है और गवाही जारी है। इडी में मामला भी चल रहा है। मतलब लालू प्रसाद परिवार चारों ओर से संकट में घिरा दिख रहा है। उनकी बेटी रोहणी आचार्या ने अपने भाई और राजद के सबसे बड़े नेता तेजस्वी और उनके सहयोगियों पर जो आरोप लगाएं हैं, वह परिवारिक दृष्टि से गंभीर हैं। अपने बहन के आरोपों का तेजस्वी को खुलासा करनी चाहिए। चूंकि यह पब्लिक डाोमिन में आ चुका है्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र। यदि रोहिणी ने पार्टी की हार के लिए संजय यादव एमपी और रमिज जो तेजस्वी के सलाहकार हैं , को जिम्मेवार ठहराया वह भी लालू यादव के घर में तो यह उचित नहीं कहा जा सकता है। इसी गुस्से में उनपर चप्पल फेंकी गयी और उनपर भी पैसा और पार्टी का टिकट लेकर पिता को किडनी देने का आरोप लगा। उसे घर की बात को मीडिया में नहंीं लेजाकर पार्टी फोरम पर उठाना चाहिए था।
लेकिन यह भी सच हेै कि अपनी बहन की बेइज्जती के लिए खुद तेजस्वी यादव भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। रोहिणी सहित दो और बहनों का लालू आवास छोड़ कर अपने अपने ससुराल चले जाना यह साबित करता है कि लालू परिवार में बिखराव बढ़ता जा रहा है। पार्टी के बड़े नेता लालू और राबड़ी धृतराष्ट्र की तरह सबकुछ देखकर चुप्पी साधे हुए हैं या फिर पार्टी में तेजस्वी के आगे उनकी कोई पूछ नहीं है। मैं लगभग छत्तीस साल से लालू को करीब से देखते आया हूं। वे कपूर्री ठाकुर के बाद पिछड़ों व मुसलमाानों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय नेता रहे हैं। वे कुटील व छल प्रपंच वाले राजनेता कभी नहीं रहे। वे दिल के साफ नेता रहे हैं। पशुपालन घोटाले में भी उन्हें उनके लोगों ने फंसाकर उनसे मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री रहते गलत दस्तफत कराया। लालू पुत्र मोह से उबर नहीं पाए। पार्टी में कई बड़े नेता के रहते हएु जैसे अबदुल बारी सिद्दीकी,जगतानंद,शिवानंद तिवारी, रामचंद्र पुर्वे आदि की जगह अपने पुत्र तेजस्वी को आगे बढ़ाया । बहरहाल, लालू को पार्टी के लिए युवा नेतृत्व चाहिए था वह नेतृत्व उन्हें अपने पुत्र तेजस्वी में दिखाई दिया। आज से चालीस साल पूर्व कांग्रेस की वेशवाद के खिलाफ आवाज उठानेवाले लालू यादव आज खुद वंशवाद की राजनीति के शिकार हो गए। तेजस्वी को लेकर परिवार में कलह और बढ़ सकती है लेकिन दूसरी ओर राजद के आम कार्यकर्ता मानते हैं कि राजद का नेतृत्व तेजस्वी ही कुशलतापूर्वक कर सकते हैं।


