क्या कुरमियों को मिल पाएगा आदिवासी का दर्जा?
चंदन मिश्र
झारखंड में सामाजिक आंदोलनों का एक लंबा इतिहास रहा है। साल या दो साल के अंतराल में आंदोलन जागृत होता है और परवान चढ़ता है। कभी-कभी ऐसा आंदोलन उग्र रूप लेता है तो कभी हिंसक हो जाता है। पृथक राज्य के लिए चले आंदोलन की परिणति झारखंड राज्य के निर्माण के रूप में सामने आ चुका है। अब इसे लेकर आंदोलन का कोई अभिप्राय नहीं है। किंतु कुरमी समुदाय का आदिवासी में शामिल करने का एक आंदोलन पिछले कई दशकों से चल रहा है, जो अभी तक किसी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच पाया है। तीन साल पहले रेल रोको नाम देकर झारखंड और इसके सीमावर्ती राज्यों ओडिशा तथा पश्चिम बंगाल के कुरमी समुदाय के लोगों के साथ मिलकर लंबा आंदोलन चलाया। कई दिनों तक लगातार रेल सेवाएं बाधित रहीं। लेकिन इसका कोई फलाफल सामने नहीं आया। इसके ठीक विपरीत झारखंड के आदिवासी समुदाय इस आंदोलन के खिलाफ उठ खड़े होते हैं और इसे विफल करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जब जब कुरमी आंदोलन शुरू होता है, जनजातीय समुदाय के विभिन्न संगठन भी तेजी से अपनी आवाज बुलंद करना शुरू कर देते हैं। दोनों तरफ से टकराव की स्थिति पैदा होती है और फिर मामला जस के तस रह जाता है। कुरमी समुदाय कभी राज्य सरकार तो कभी केंद्र सरकार को इसके लिए आरोपित करता है। पिछले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कुरमी आंदोलित हुए थे। आंदोलनकारियों को लगा कि चुनाव के पहले सरकार पर दबाव बनेगा और राज्य सरकार कुर्मियों को आदिवासियों की सूची में शामिल करने की अनुशंसा करेगी। लेकिन कुर्मियों के खिलाफ आदिवासी आंदोलित हो गए, जिसका नतीजा शून्य रहा।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि कुरमी समुदाय के इस आंदोलन को धार देने के लिए कोई ठोस नेतृत्व नहीं मिल पा रहा है। जिसका नतीजा है कि टुकड़ों – टुकड़ों में यह आंदोलन होता है और यह आंदोलन समग्रता का रूप नहीं ले पा रहा है।
अभी पिछले सप्ताह झारखंड के कुरमी समुदाय के लोगों ने झारखंड से उठकर नई दिल्ली तक पहुंचकर अपनी आवाज बुलंद करने की ठानी। झारखंड,बंगाल और झारखंड के कुरमी समुदाय के लोगों ने बड़ी संख्या में दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दिया। इन आंदोलदनकारियों की यही मांग थी कि कुर्मियों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया जाए। साथ ही कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। कुरमी समुदाय के महिला पुरुष अच्छी खासी संख्या में दिल्ली पहुंचे हुए थे। उनका धरना प्रदर्शन भी प्रभावकारी रहा। लेकिन केंद्र सरकार ने इसे फ़िलहाल नोटिस नहीं लिया। एक बात और महत्वपूर्ण है कि इस आंदोलन में कुरमी समुदाय के जनप्रतिनिधि सांसद और विधायक कभी भी एकजुट होकर आंदोलन का हिस्सा नहीं बने। शायद यह भी आंदोलन के बार बार विफल होने का एक बड़ा कारण होगा।
झारखंड बनने के बाद 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में कैबिनेट में एक प्रस्ताव आया था। उस प्रस्ताव में छोटानागपुर के कुरमी / कुड़मी ( महतो ) और घटवार जाति को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं किए जाने की बात कही गई थी। दरअसल झारखंड जनजातीय शोध संस्थान की अनुशंसा के आलोक में ही राज्य सरकार किसी भी जाति या समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) या अनुसूचित जाति (एससी) में शामिल करने की अनुशंसा करती है। लेकिन संस्थान ने इनकी अनुशंसा नहीं की। जबकि 1950 के पहले कुरमी और घटवार समुदाय अनुसूचित जनजाति की सूची में सूचीबद्ध थे। लिहाजा पूरा मामला झारखंड जनजातीय शोध संस्थान की रिपोर्ट के आधार पर ठंडे बस्ते में चला जाता है। झारखंड सरकार जब तक नहीं चाहेगी, झारखंड के कुरमी अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में नहीं आ सकते हैं। तब तक इस समुदाय को लंबे और निर्णायक आंदोलन का इंतजार करना होगा।


