राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड में कुरमी समाज खुद को आदिवासी समाज (अनुसूचित जनजाति) में शामिल कराने के लिए बेचैन है। लिहाजा कुरमी समाज ने जोरदार आंदोलन छेड़ते हुए आज राज्य के विभिन्न इलाकों में रेलवे स्टेशनों और ट्रैक पर जाकर पैसेंजर्स ट्रेनों को रोकने की कोशिशें की। इसकी वजह से कई रेल गाड़ियां के आवागमन पर प्रभाव पड़ा है। हजारों यात्रियों को काफी परेशानी उठानी पड़ी है। लेकिन जनता की सेवा का दावा करनेवाले राजनीति दलों को कभी कभी जनता की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं होता है। यह तो आंदोलन का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष दिलचस्प है। झारखंड का आदिवासी समाज कुरमी समाज के इस आंदोलन से न सिर्फ खफा है, बल्कि इसका खुलकर विरोध कर रहा है। आदिवासी समाज और कुरमी समुदाय आज खुलकर आमने सामने आ चुके हैं।
रेल टेका आंदोलन के जवाब में अब आदिवासी समाज और जनजातीय संगठनों ने भी मोर्चा खोल दिया है। राजभवन के सामने आदिवासी समाज के लोगों ने जमकर नारेबाजी की और कुरमी( कुड़मी ) समाज को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची में शामिल करने का विरोध किया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि कुरमी (कुड़मी) समाज को किसी भी हाल में आदिवासी नहीं बनने दिया जाएगा। कुरमी (कुड़मी) समाज पूरे झारखंड में रेल टेका आंदोलन चला रहा है। वे खुद को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। आदिवासी समाज के लोगों ने राजधानी रांची में राजभवन के सामने धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। उनका कहना है कि कुड़मी समाज के लोगों को देश में पहले से ही ओबीसी का दर्जा प्राप्त है। ये कभी आदिवासी नहीं थे, इसलिए इन्हें आदिवासी का दर्जा नहीं दिया जा सकता। धरना स्थल पर मौजूद आदिवासी नेताओं ने कहा, “अगर संविधान ने कुरमी (कुड़मी) समाज को रेल रोकने का अधिकार दिया है, तो हमें भी धरना-प्रदर्शन का अधिकार मिला है। हम यहां अपनी बात केंद्र सरकार तक पहुंचाने के लिए बैठे हैं। जबरन कोई आदिवासी नहीं बन सकता। हम आज भी कुड़मी समाज को अपना पड़ोसी मानते हैं, लेकिन हमारे आरक्षण और अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं होने देंगे।” एक समाजसेवी ने कहा, कुरमी “(कुड़मी) समुदाय पूरे देश में ओबीसी श्रेणी में है। फिर झारखंड के कुड़मी आदिवासी क्यों बनना चाहते हैं? यह उनकी नाजायज मांग है। आजादी के पहले कौन क्या था, यह हमें नहीं मालूम। लेकिन आजादी के बाद जब संविधान बना, तब इनके प्रतिनिधियों ने कभी नहीं कहा कि वे आदिवासी हैं। उनका आंदोलन सिर्फ 10 साल पुराना है, जबकि वे कहते हैं कि यह 70 साल पुराना है।”
झारखंड में यह आंदोलन ऐसे वक्त पर शुरू हुआ है, जब पड़ोसी राज्य बिहार में अगले महीने से चुनावी प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। ऐसे समय में केंद्र सरकार के नेताओं का सारा ध्यान बिहार के चुनाव पर केंद्रित रहेगा। ऐसे में कुरमी समुदाय का आंदोलन कहीं उल्टा न पड़ जाए। केंद्र सरकार फिलहाल इधर ध्यान भी क्यों देगी, जब तक राज्य सरकार इसकी अनुशंसा केंद्र को नहीं करेगी।
झारखंड बनने के बाद कुरमी समुदाय कई बार आंदोलन कर चुका है। कभी एक दिन का, कभी दो और कभी तीन दिनों का आंदोलन हो चुका है। धरना प्रदर्शन के अलावा कुरमी समुदाय ने ट्रेन रोकने का आंदोलन सबसे ज्यादा किया है। यह बहुत अजीब बात है कि जो काम राज्य सरकार के हाथों शुरू होना है, और राज्य सरकार की अनुशंसा पर ही केंद्र सरकार को फैसला लेना है, उसके खिलाफ कुरमी समुदाय कुछ नहीं करता है। आज सबसे पहले राज्य सरकार को ही दबाव में लाना होगा। राज्य सरकार जब इसकी अनुशंसा कर देगी तो केंद्र का काम आसान हो जाएगा। लेकिन क्या ऐसा लगता है कि राज्य की हेमंत सोरेन सरकार कुरमी (कुड़मी) समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी ) में शामिल करने की अनुशंसा करेगी ? इसकी संभावना बिल्कुल ही नहीं है। झारखंड में वर्ष 2003 में भी ऐसी परिस्थितियां सामने आई थी, जब जनजातीय शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान ने कुरमी समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल न करने की राज्य सरकार को अपनी अनुशंसा भेजी थी। तब अर्जुन मुंडा झारखंड के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने जनजातीय शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान की अनुशंसा को कैबिनेट में लाकर इसे अनुमोदित किया था। अर्थात झारखंड के कुरमी समुदाय को राज्य सरकार अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के समर्थन में बिल्कुल नहीं है। अब परिस्थितियां बदल जाएं तो बात अलग होगी।
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