– भाजपा अंतर्कलह की शिकार, कई शहरों में पिछड़ी
– निर्दलीय प्रत्याशियों ने नगर निगम की तीन सीटों पर कब्जा जमाया
चंदन मिश्र
झारखंड में नगर निकाय चुनाव के परिणाम ने यह साबित कर दिया कि शहरी वोटरों पर सिर्फ भाजपा ही नहीं झामुमो का भी अब अच्छा खासा प्रभाव बढ़ा है। भाजपा को इस बार नगर निकाय चुनाव में बड़ा झटका लगा है। उसकी न सिर्फ सीटें घटी हैं, बल्कि नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत में कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ा है।
इस चुनाव में निर्दलीयों ने दलीय समर्थित उम्मीदवारों को जबरदस्त पटकनी दी है। झामुमो, भाजपा और कांग्रेस जैसे दल अंतर्कलह के कारण कई सीटों पर अपने समर्थित उम्मीदवारों को जिताने में विफल रहे। कांग्रेस समर्थित सिर्फ एक उम्मीदवार को मानगो नगर निगम चुनाव में सफलता मिली।
झामुमो ने देवघर और गिरिडीह नगर निगम की सीट पर इस बार कब्जा जमाकर सबको चौंकाया है। नगर पंचायत और नगर परिषद की 39 सीटों में से नौ सीटों पर झामुमो समर्थित उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। वहीं भाजपा समर्थित सिर्फ दस उम्मीदवार ही जीत पाए। इनके अलावा 17 ऐसे प्रत्याशी नगर पंचायत और नगर परिषद में जीतकर आए जिन्हें किसी दल का समर्थन नहीं था। शेष दो में एक कांग्रेस और दूसरा माले समर्थक उम्मीदवार ने जीत हासिल की।
पिछले चुनाव में भाजपा ने मेयर की पांचों सीटों पर कब्जा जमाया था, इस बार भाजपा समर्थित तीन ही सीटों पर सफलता मिली है। रांची, मेदिनीनगर और आदित्यपुर के मेयर भाजपा समर्थित चुने गए, जबकि झामुमो समर्थित देवघर के रवि राउत और गिरिडीह की प्रमिला मेहरा जीतकर आई हैं। हजारीबाग, धनबाद और चास से निर्दलीय प्रत्याशी जीते। मानगो नगर निगम कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी के हिस्से गया है। रांची, मेदिनीनगर , हजारीबाग, आदित्यपुर, गिरिडीह और धनबाद पिछली बार भाजपा के खाते में गया था। मानगो नया नगर निगम बनाया गया है। देवघर और चास पिछली बार निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गया था। इस बार भी चास निर्दलीय के खाते में गया। झामुमो ने पहली बार गिरिडीह और देवघर नगर निगम पर कब्जा जमाने में सफलता पाई है।
भाजपा पूरे प्रदेश में पूरी शिद्दत के साथ चुनाव तो लड़ी, लेकिन दल के अंतर्कलह से निपट नहीं पाई। उसकी सियासी जमीन खिसक गई। इसका खामियाजा पार्टी को चुनाव नतीजों में भुगतना पड़ा। नौ नगर निगम में धनबाद, मानगो, हजारीबाग, गिरिडीह और देवघर नगर निगम में भाजपा के बागी और असंतुष्ट नेताओं को भाजपा नेतृत्व संभाल पाने में पूरी तरह विफल रहा। धनबाद में उम्मीदवार बदला गया, उसका नतीजा साफ दिखा। संजीव सिंह भाजपा के पूर्व विधायक रहे हैं। बागी बनकर चुनाव मैदान में उतरे। वहीं पिछले मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल को भाजपा ने समर्थन नहीं देकर संजीव अग्रवाल को अपना समर्थित उम्मीदवार घोषित कर दिया। उसका नतीजा रहा, भाजपा समर्थित उम्मीदवार तीसरे नंबर पर चले गए। गिरिडीह में भाजपा समर्थित उम्मीदवार शैलेंद्र चौधरी को यूजीसी कानून की मार का सामना करना पड़ा। ऊपर से नगर विकास मंत्री सह गिरिडीह के विधायक सुद्धिव्य कुमार सोनू ने चुनाव को प्रतिष्ठा का विषय बना लिया था। हजारीबाग में भाजपा ने सुदेश चंद्रवंशी को समर्थन तो दिया, लेकिन स्थानीय सांसद और विधायक का इन्हें हार्दिक समर्थन नहीं मिला, नतीजा भाजपा पिछड़ गई। देवघर और मानगो नगर निगम में भाजपा के वोटों का बिखराव और दलीय अंतर्कलह उसके उम्मीदवारों को ले डूबा।
झामुमो ने पूरा चुनाव रणनीतिक तौर लड़ा। जहां उसे अपनी बेहतर संभावना दिखी, वहां झामुमो पूरी ताकत झोंक दी। उसका बेहतर नतीजा देखने को मिला। दो नगर निगम और नौ नगर परिषद तथा नगर पंचायतों में कब्जा जमाकर अपना झंडा शहरी सरकार में भी गाड़ दिया है।
भाजपा ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। केंद्र से भाजपा के महासचिव अरुण सिंह नगर निकाय चुनाव की रणनीति बनाने के लिए खासकर तैनात किए गए थे। लेकिन उनकी उपस्थिति का कोई खास असर नहीं दिखाई दिया। उन्होंने बागियों और असंतुष्ट नेताओं को मनाने में पूरी तरह विफल रहे।
इस चुनाव में कांग्रेस की दुर्दशा देखने को मिली। रांची राजधानी में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार रमा खलखो के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा कर झामुमो और राजद समर्थित उम्मीदवारों ने उनकी जीत के रास्ते पर कांटे बिछा दिए। मेदिनीनगर में भी कांग्रेस और झामुमो समर्थित उम्मीदवार आमने सामने भिड़े और इसका फायदा भाजपा समर्थित उम्मीदवार को मिला। राजद और आजसू जैसी पार्टियों का निकाय चुनाव में उपस्थिति भी दर्ज नहीं हो पाई। इस चुनाव परिणाम में झामुमो और मजबूत बनकर उभरा,जबकि भाजपा को उम्मीद से कम सफ़लता मिल पाई।
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