रावी नदी का पानी पाकिस्तान के बजाय अपने दूसरे राज्यों में भेजना शुरू
नई दिल्ली । भारत द्वारा पाकिस्तान को जाने वाली नदियों का पानी रोकने के लिए चलाए गए महत्वाकांक्षी ऑपरेशन सिंदूर के तहत शुरू किए छह प्रमुख हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स का काम अब धीमा पड़ गया है। करीब 4,963 मेगावॉट क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स का मकसद पाकिस्तान को मिलने वाले पानी को भारत में ही रोककर बिजली बनाना और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करना था। केंद्र सरकार के दबाव और तेजी से काम पूरा करने के निर्देशों के बावजूद, ये प्रोजेक्ट प्रशासनिक अड़चनों, पर्यावरण मंजूरी, मजदूरों के विवाद और प्राकृतिक आपदाओं जैसी कई बाधाओं के कारण अटके हुए हैं।
नेशनल हाइड्रो पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी) के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दो प्रोजेक्ट करीब पूरे होने वाले थे, लेकिन अंतिम चरण में फंस गए। अब नई मंजूरियां मिलने के बाद इन्हें पूरा होने में 2-3 साल का अतिरिक्त समय लग सकता है। यह परियोजनाएं भारत द्वारा सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के बाद शुरू की गई थीं। पहलगाम हमले के उपरांत, चिनाब और झेलम नदियों के पानी का उपयोग भारत में करने के लिए इन परियोजनाओं को गति दी गई। इसमें से सबसे महत्वपूर्ण, 1,856 मेगावॉट क्षमता वाला सावलकोट प्रोजेक्ट विशेष रूप से प्रभावित हुआ है, जिसका ग्लोबल कंसल्टेंसी टेंडर अचानक रद्द किया गया था। इसकी फाइल अब निवेश संवर्धन बोर्ड (पीआईबी) और आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीआईसी) की मंजूरी का इंतजार कर रही है।
हालांकि, सिंधु जल समझौता स्थगित होने के बाद भारत ने रावी नदी का पानी पाकिस्तान के बजाय अपने दूसरे राज्यों में भेजना शुरू किया है। इसके लिए पंजाब में शाहपुर कंडी बैराज और रणजीत सागर डैम का सफलतापूर्वक उपयोग हो रहा है। इसी तरह, जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बने बगलिहार और सलाल हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के जरिए भी पानी के बहाव को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया गया है। इन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए, केंद्र सरकार और ऊर्जा मंत्रालय अब एक विशेष टास्क फोर्स या उच्चस्तरीय निगरानी समिति गठित करने पर विचार कर रहे हैं। एनएचपीसी और अन्य संबंधित एजेंसियां भी लंबित मंजूरियों की प्रक्रिया में तेजी लाने के उपाय कर रही हैं, ताकि ऑपरेशन सिंदूर अपने पूर्ण लक्ष्य को प्राप्त कर सके।


