• राम को 30 और नथवाणी को 28 वोट
• कांग्रेस के प्रणव को सिर्फ 20 वोट मिले
• तीन वोट अवैध घोषित हुए
• क्रॉस वोटिंग में निर्दलीय की जीत, कांग्रेस की हार
• इंडिया गठबंधन की एकता हुई तार-तार
संवाददाता
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव का परिणाम आते ही इंडिया गठबंधन के अंदरुनी हालात बेपर्द हो गया। चुनाव में इंडिया गठबंधन की ओर से झामुमो के बैजनाथ राम और एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवाणी चुनाव जीत गये। कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा चुनाव हार गय। बैजनाथ राम को सबसे अधिक 31 और परिमल नथवाणी को 28 वोट मिले। जबकि कांग्रेस के प्रणव झा को सिर्फ 19 वोट मिले। तीन वोट अवैध घोषित किये गये। चुनाव परिणाम आते ही इंडिया गठबंधन की एकता तार-तार हो गई। पिछले एक पखवाड़े से एकता के गीत गा रहे सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन के नेता और दल अब एक-दूसरे पर दोष मढ़ने में लग गये हैं। सत्ता के गलियारों में चल रहे शह और मात के खेल के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा और एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार ने शानदार बाजी मार ली है। वहीं, बड़े-बड़े रणनीतिकारों को मैदान में उतारने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। इस चुनाव में क्रॉस वोटिंग इंडिया गठबंधन के दलों की एकता को छिन्न भिन्न कर दिया। चुनावी नतीजों ने इंडिया गठबंधन की एकजुटता की कलई खोलकर रख दी है, जिससे आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सत्ताधारी खेमे में बेचैनी बढ़ना तय है।
नतीजों का गणित ( कुल 81 वोट)
81 वोट पड़े, 78 वैध, 3 वोट रद्द् किए गए
झामुमो उम्मीदवार : 30 वोट
निर्दलीय परिमल नाथवाणी : 28 वोट
कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा : 20 वोट
परिमल नथवाणी : चौथी बार राज्यसभा पहुंचे
झारखंड की राजनीति में परिमल नथवाणी एक ऐसा नाम बन चुके हैं, जिन्हें सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने का महारथी माना जाता है। इस जीत के साथ ही नथवाणी ने रिकॉर्ड चौथी बार राज्यसभा पहुंचने का गौरव हासिल किया है। हालांकि, वह लगातार चौथी बार एक ही राज्य से जीतकर एक अद्वितीय इतिहास रचने से मामूली रूप से चूक गए, क्योंकि उनका पिछला कार्यकाल आंध्र प्रदेश से था। इसके बावजूद, झारखंड की धरती पर उनका जादू एक बार फिर सिर चढ़कर बोला।
हेमंत सोरेन का मास्टरस्ट्रोक
एक तरफ जहां परिमल नथवाणी की जीत के पीछे कॉर्पोरेट और राजनीतिक मैनेजमेंट की ताकत थी, वहीं दूसरी तरफ झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत विशुद्ध रूप से एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक संदेश है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बैजनाथ राम को राज्यसभा भेजकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। लातेहार क्षेत्र सहित पूरे झारखंड के अनुसूचित जाति समाज में बैजनाथ राम की पैठ बेहद गहरी और मजबूत मानी जाती है। राज्य में कुछ ही महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में ऐन वक्त पर एक प्रमुख दलित चेहरे को देश के उच्च सदन में भेजकर हेमंत सोरेन ने राज्य के दलित और वंचित समाज को यह साफ संदेश दे दिया है कि उनके हितों की असली रक्षक झामुमो ही है। बैजनाथ राम की यह जीत झामुमो के पारंपरिक ‘आदिवासी-मूलवासी’ वोट बैंक के साथ-साथ दलित मतदाताओं को जोड़ने की रणनीति में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है।
क्रॉस वोटिंग का खेल:
इस चुनाव का सबसे स्याह पहलू कांग्रेस के लिए रहा। कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार सिर्फ एक व्यक्ति की हार नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के आंतरिक असंतोष और गठबंधन के भीतर गहरे अविश्वास की कहानी बयां करती है। मतदान के दौरान हुई ‘क्रॉस वोटिंग’ ने साफ कर दिया कि गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। दावे किए जा रहे थे कि इंडिया गठबंधन के पास अपने दोनों उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त संख्या बल है, लेकिन जब बैलेट बॉक्स खुला तो सारे दावे हवा हो गए। यह क्रॉस वोटिंग इसलिए भी ज्यादा शर्मनाक है क्योंकि कांग्रेस आलाकमान इस चुनाव को लेकर बेहद गंभीर था।
बड़े बड़े रणनीतिकार परास्त
कांग्रेस पार्टी इस चुनाव को कितनी प्रतिष्ठा की लड़ाई मान रही थी। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के. राजू और सह-प्रभारी श्री बेला प्रसाद को पोलिंग एजेंट बनाया गया था। पार्टी के इन दो सबसे बड़े दिग्गजों की सीधी निगरानी में मतदान हो रहा था। हर एक विधायक पर पैनी नजर रखने के निर्देश थे। आलाकमान के ये सिपहसालार अपनी ही पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने और क्रॉस वोटिंग रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे।
झाममो का नया दांव
बैजनाथ राम की जीत के बाद झामुमो अब खुद को दलितों के मसीहा के रूप में पेश करेगा, जिससे भाजपा के पारंपरिक दलित वोट बैंक में सेंध लगने का खतरा बढ़ गया है। इस सियासी जंग ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं। परिमल नथवाणी की ‘घर वापसी’ और बैजनाथ राम का ‘उदय’ जहां एनडीए और झामुमो के लिए जश्न का मौका लेकर आया है, वहीं कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन की एक ऐसी गंभीर घड़ी है, जिसे अगर अनदेखा किया गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए संभलना मुश्किल हो जाएगा।


