अशोक कुमार
झारखंड विधानसभा का चार दिवसीय मौनसून सत्र तीन दिन भी ठीक से नहीं चल सका। पहले दिन से लेकर तीसरे दिन मंगलवार तक पक्ष विपक्ष के हो हल्ले और हंगामे के कारण तीनों दिन तक स्पीकर को सदन की कार्यवाही कई बार स्थगित करने को बाध्य होना पड़ा। तीसरे दिन मंगलवार को पक्ष विपक्ष के सदस्यों के सदन के अंदर हंगामे व प्रदर्शन के कारण पाहली पाली में दो बार सदन को स्थगित करनी पड़ी।पहली पाली में सदन दस मिनट ही चली। इस तरह देखें तो चार दिनों का संक्षिप्त मौनसून सत्र को भी माननीयों ने सही सलामत चलने नहीं दिया। मालूम हो कि विधानसभा की पहली पाली ग्याहर बजे से एक बजे तक के समय पूरे राज्य के जन सरोकार के मुद्दों से जुड़ा होता है। प्रश्रकाल में माननीय विधायक सरकार से जन सरोकार व विभागों से जुड़े मुद्दे पर प्रश्र करते हैं। सरकार की ओर से मंत्रिगण तारांकित और अल्पसूचित प्रश्रों के उत्तर देते हैं। सरकारी उत्तर से संतुष्ठ नहीं होने पर विधायक गण पूरक प्रश्र पूछ कर सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं। सरकार कीओर से यह आश्वासपन भी मिलता है कि अमुक समस्या का समाधान कब तक करेंगे। बारह बजे से एक बजे तक शून्यकाल होता है। शून्यकाल में विधायक गण अपने अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाते हैं। पिछले तीन दिनों तक सदन की महत्वपूर्ण पहली पाली हो हल्लाा और हंगामे की भेंट चढ़ गयी। जनता के मुद्दे गायब हो गए। जिस जनता के वोट से चुनकर वे विधायक बने हैं, उन्हीें की समस्याओं को वे सदन में उठने नहीं दिए। इसके लिए यदि कोई जिम्मेवार हेेै तो वे स्वयं माननीय हैं। मैं विहार विधानसभासहित झारखंड विधानसभा में रिपोॄग करता रहा हूं। मुझे अभी तक समझ में नहीं आ सका है कि विधानसभा में सदस्यों के हल्ले हंगामे और प्रदश्रन का कितना फायदा नहीं हो पाता है। लोकतंत्र में किसी को भी विरोध प्रदर्शन करले का अधिकार है लेकिन उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे सदन की कार्यवाही को चलने में अमर्यादित ढंग से बाधा उत्पन्न करें। इस तरह की गैरजिम्मेदाराना हरकत से उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता है । सिर्फ मीडिया में वे हाइलाइट होकर संतुष्ठ हो जाते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है बिहार विधानसभा में कार्यवाही के दौरान तत्कालीन भाजपा विधायक स्व समरेश सिंह बोलते बोलते अपना कुर्ता फाड़ डालते थे और ऊपर बैठे पत्रकार दीर्घा को दिखाते थे। वे अपनी इस करतूत से मीडिया में प्रचार चाहते थे। विधानसभा में प्रति दिन के सत्र पर जनता की गाढ़ी कमाई का भगभग बीस लाख से ऊपर खर्च होता है। इसमें सिर्फ विधायकों ,उनके ड्राइबरों, पीए, अंगरक्षकों और उनके क्षेत्र से आए लोगों के भोजन पर प्रतिदिन लगभग पांच लाख का खर्च होता है। सदन जब चलती है तो सरकार के बीडीओ से लेकर सचिव तक की विधानसभा में डयूटी होती है। सदन के नहीं चलने पर उनका भी कीमती वक्तबर्बाद होता है। मेरा स्पीकर से आग्रह हेै कि जो माननीय सदन चलने में बाधा उत्पन्न करते हैं उन्हें उस दिन का टीए डीए व दैनिक भत्ता भुगतान रोक कर उन्हें एक सबक देनी चाहिए। मंगलवार को सदन शुरू होते ही पक्ष विपक्ष के सदस्यों ने जिन मुद्दे को लेकर सदन के अंदर प्रदर्शन कर सदन को चलने नहीं दिया उससे आम जनता को कोई मतलब नहीं था। दोनों पक्षों के मुद्दे जन सरोकार के कम राजनीतिक ज्यादा थे। सदन जनता एंव राज्य की ज्वलंत समस्याओं पर बहस करने व सरकार का ध्यान आकृष्ट करने का एक मात्र सर्वोच्च संसदीय मंच है। इस मंच का उपयोग राजनीतिक मुद्दे उठाने के लिए नहीं होनी चाहिए। स्पीकर को भी निष्पक्ष होकर ऐसे मुद्दे उठाने पर रोक लगानी चाहिए। पक्ष विपक्ष के जो सदस्य संसदीय परंपरा भंग कर ऐसी हरकत करते हैं तो उन्हें मार्शल आउट किया जाना चाहिए या उन्हें सदन से वर्तमान सत्र से निलंबित करना चाहिए। जब तक वे कठोर कदम नहीं उठाएंगे तब तक उन्हें सदन स्थगित करने केलिए मजबूर होना पड़ेगा, जो संसदीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। हमारे माननीय को भी यह सोचना होगा कि वे आखिर जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि हैं। जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे से संचालित होनेवाले सदन को बाधित कर वे उनका अहित कर रहे हैं। जनप्रतिनिधियों को अपने दल के साथ साथ जनता के प्रति भी जिम्मेवार होना होगा। इस प्रकरण पर विधानसभा अध्यक्ष माननीय रवीन्द्र नाथ महतो क हते हैं कि यह अच्छी परिपाटी नहीं है।जनता के मुदद्े को सदन में नहीं उठने देना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस पर सभी दलों के नेताओं को मिलकर विचार करना होगा। जब उनसे पूछा गया कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के लिए आप किसे जिम्मेवार मानते हैं तो वे मेरे इस सवाल को कोई जबाव नहीं दे सके।


