अशोक कुमार
बिहार चुनाव एक रोचक मोड़ पर आ गया है। महागठबंधन ने जहां देर सबेर तेजस्वी यादव को सीएम चेहरा घोषित कर दिया है वहीं दूसरी तरफ एनडीए ने अभी तक सीएम का चेहरा घोषित नहीं किया है। गृह मंत्री अमित साह के इस बयान ने एनडीए में खलबली मचा दी है कि चुनाव के बाद एनडीए विधायक दल नेता का चुनाव करेगा। साफ है कि एनडीए ने एक सोची समझी रणनीति के तहत नीतीश कुमार को चुनाव पूर्व सीएम फेस घोषित नहीं किया है। इसका एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि भाजपा चुनाव के बाद यदि एनडीए गठबंधन को बहुमत मिला तो नेतृत्व में परिवर्तन हो सकता है। भाजपा नीतीश की जगह किसी युवा के हाथों में मध्यप्रदेश, राजस्थान व दिल्ली की तरह सत्ता की बागडोर सौंप सकती है। बिहार के राजनीतिक गलियारे में इस बात की चर्चा है कि नीतीश कुमार को एनडीए के नेता खराब स्वास्थ्य को देखते हुए किसी युवा के हाथों में सत्ता सौंपने पर राजी कराने की पूरी कोशिश कर सकते हैं। लेकिन यह भी चर्चा है कि भाजपा नीितीश कुमार को नाराज कर केंद्र सरकार को संकट में नहीं डाल सकती है। मालूम हो कि केंद्र की मोदी सरकार नीतीश व चन्द्रबाबू नायडू के वैशाखी के सहारे ही चल रही है। यह भी चर्चा है कि भाजपा नेतृत्व नीतीश कुमार को केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़ी जिम्म्ेावारी सौंप सकती है। यदि भाजपा ने जदयू को तोडऩे की कोशिश की तो वैसी स्थिति में नीतीश महागठबंधन से हाथ मिला ले तो कोई आश्चर्य नहीं मानी जाएगी। राजनीति में पद के लिए कोई भी नेता कोई करवट ले सकता है। नीतीश कुमार का पूर्व का इतिहास यह साबित करता है। एनडीए में 29 सीटें पाकर भी असंतुष्ठ चल रहे लोजपा आर के चिराग पासवान यदि उन्हें चुनाव के बाद पन्द्रह से अधिक सीटें मिल गयी तो वे भी एनडीए नेताओं के साथ वारगेनिंग कर सकते हैं। बात नहीं बनने पर चिराग कोई भी कदम उठा सकते हैं। अब आइए महागबंधन पर चर्चा करें। महागठबंधन में टिकटों को लेकर महाभारत मचा हुआ है। महागठबंध के नेता डिप्टी सीएम के रूप में मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम घोषित कर बुरी तरह फंस चुके हैं। औबेसीउद्दीन का कहना है कि दो प्रतिशत की आबादी वाले मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम घोषित कर दिया गया लेकिन 19 प्रतिशत मुसलमानों को महागठबंधन के नेताओं ने उपेक्षा की है। मुसलमानों का एक तबका राजद व कांग्रेस से नाराज चल रहा है। इससे इंकार नहंी किया जा सकता है कि राजद में मुसलमानों की उपेक्षा की गयी है। अब्दुलबारी सिद्दीकी जैसे पुराने समाजवादी नेता को चुनाव प्रचार में कोई महत्वपूर्ण दायित्व नहीं दिया गया है। नाराज मुसलमानों को मनाने के लिए तेजस्वी एक युवा और नये मुसलमान नेता को अपने साथ हेलीकाँप्टर पर लेकर घूम रहे हैं। मुसलमान केंद्र के वक्फ बोर्ड कानून से डरे हुए हैं। राजद नेता तेजस्वी यादव यह कहकर मुसलमानों के सेंटीमेंट को भजाना चाह रहे हैं कि यदि उनकी सरकार बिहार में सत्ता में आती है तो वक्फ बोर्ड कानून को वे फाड़कर फेंक देंगे। आम मुसलमानों को यह पता नहीं है कि संसद से पास कानून को कोई राज्य सरकार बदल नहीं सकती है। कानून की प्रति को फाड़ कर फेंक कर तेजस्वी मुसलमानेां की सहानुभूति भले पा सकते हैं लेकिन उससे मुसलमानों को कोई फायदा नहीं होनेवाला है। बिहार के शिक्षित मुसलमान इस बात को समझते हैं। बिहार की आम जनता को अच्छी सड़कें, बिजली, पानी, गरीबों को मुफ्त में अनाज और अपराध से मुक्ति चाहिए। लेकिन महागठबंधन के नेता इन चीजों की गारंटी नहीं दे रहे हंैै। हां , वह रोजगार देने व पलायन रोकने की बात जरूर कर रहे है। तेजस्वी ने पिछली सरकार में उप मुख्यमंत्री रहते बड़े पैमाने पर रोजगार देने का काम जरूर किया था, जो सरकार बदले जाने पर पूरी तरह से कार्यान्वित नहीं हो सका ।तेजस्वी में युवा का जोश व उत्साह के साथ नेतृत्व देने की क्षमता को दिखती है लेकिन दूसरी ओर एनडीए में युवा नेतृत्व का अभाव परिलक्षित होता है। चिराग पासवान और सम्राट चौधरी में एनडीए के युवा चेहरे जरूर हैं लेकिन वे नेतृव के कतार में नहीं है। एनडीए में नेतृत्व पचहत्तर साल के नीतीश कुमार के वृद्ध कंधों पर है।


