दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े फैसले के बाद मिल रही धमकियों का मामला
लंदन में रह रही बेटी को भी बनाया जा रहा निशाना
नई दिल्ली । बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस गौतम पटेल को उनके एक न्यायिक फैसले के संबंध में मिल रही धमकियों के मामले ने अब गंभीर रूप ले लिया है। इस मुद्दे पर देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने संज्ञान लेते हुए जस्टिस पटेल और उनके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की अपील की है। बताया गया है कि सीजेआई ने अपने आधिकारिक ब्रिटेन दौरे के दौरान लंदन स्थित भारतीय उच्चायुक्त के समक्ष यह मामला उठाया और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता व्यक्त की।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मामला सामने आते ही सीजेआई सूर्यकांत ने लंदन में भारत के उच्चायुक्त पी. कुमारन से संपर्क किया। भारतीय उच्चायोग ने जस्टिस पटेल और उनके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया है। साथ ही लंदन पुलिस द्वारा भी सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाए जाने की जानकारी दी गई है। सीजेआई ने बॉम्बे हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को भी इस मामले में आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
बार एसोसिएशन ने की नींदा
इस बीच बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी जस्टिस पटेल को दी जा रही धमकियों की कड़ी निंदा की है। संगठन ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन पर सीधा हमला करार दिया। एसोसिएशन ने कहा कि किसी न्यायाधीश पर दबाव बनाकर या धमकाकर न्यायिक निर्णय बदलवाने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। उसने भारत और ब्रिटेन की जांच एजेंसियों से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
जस्टिस गौतम का खुलासा
गौरतलब है कि जस्टिस गौतम पटेल ने हाल ही में खुलासा किया था कि उन्हें वर्ष 2024 में दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े एक ऐतिहासिक फैसले के कारण धमकी भरे संदेश और पत्र मिल रहे हैं। उन्होंने अपने फैसले में सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन को दाऊदी बोहरा समुदाय का 53वां आध्यात्मिक गुरु घोषित किया था। इस फैसले के खिलाफ अपील भी लंबित है। पूर्व जज के अनुसार, धमकी देने वाले लोग उनसे सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करने का दबाव बना रहे हैं कि उनका फैसला गलत था। इसके लिए यूट्यूब पर वीडियो जारी करने की मांग तक की गई है। जस्टिस पटेल का कहना है कि मुंबई में सीधे कार्रवाई संभव न होने के कारण उनकी लंदन में रहने वाली बेटी को निशाना बनाया जा रहा है। इस घटनाक्रम ने न्यायाधीशों की सुरक्षा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।


