जल, जंगल और ज़मीन की प्रखर आवाज़: एनी टुडू के साथ एक महिला दिवस पर विशेष संवाद
एस.के.झा.’सुमन’
दुमका। नगर के लखीकुंडी की मिट्टी से निकलकर ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने तक का सफर तय करने वाली एनी टुडू आज संताल परगना में बदलाव का दूसरा नाम हैं। ‘संवाद’ संस्था के माध्यम से बीते डेढ़ दशक से अधिक समय से वे आदिवासी समाज की जड़ों को सींच रही हैं।
एनी का काम केवल कागजों तक सीमित नहीं है; उन्होंने सांस्कृतिक अखाड़ों के जरिए पारंपरिक पहचान को पुनर्जीवित किया है और ग्राम सभा सशक्तिकरण को धरातल पर उतारा है। उनके लिए आजीविका का अर्थ केवल पैसा कमाना नहीं, बल्कि अपने संसाधनों पर हक जताते हुए स्वाभिमान के साथ जीना है। विभिन्न मुद्दे को लेकर इनसे संताल एक्सप्रेस के ब्यूरो प्रभारी एस.के झा. ‘सुमन’ ने ने खास बातचीत
सवाल : इन 15-16 वर्षों में वह कौन सा क्षण था जिसने आपको सबसे ज्यादा सुकून दिया या यह अहसास कराया कि आपका संघर्ष सही दिशा में है।
एनी टुडू : जब ग्राम सभाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और समस्याओं के समाधान में उनका सशक्त नेतृत्व देखा, तब संघर्ष सार्थक लगा।
सवाल: एक कार्यकर्ता के रूप में आपकी नज़र में ‘विकास’ की सही परिभाषा क्या है, जो शहरों से आती है या जो ग्राम सभाओं से उपजती है?
एनी टुडू : असली विकास शहरों से नहीं, बल्कि ग्राम सभाओं से उपजता है। जब महिलाएँ स्वावलंबी हों और कम से कम 75 फीसद जैविक खेती फले-फूले, तभी सच्चा विकास संभव है।
सवाल : अगले 5 वर्षों में अपने क्षेत्र के लिए किस तरह का बदलाव देखना चाहती हैं?
एनी टुडू : अगले 5 वर्षों में मैं अपने क्षेत्र को शिक्षित, डिजिटल रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर देखना चाहती हूँ, जहाँ महिलाओं को स्वरोजगार मिले और बुनियादी सुविधाएँ हर घर तक पहुँचें।
सवाल: आने वाले समय में आदिवासी नेतृत्व और महिलाओं की भागीदारी को लेकर आपकी क्या उम्मीदें हैं?
एनी टुडू : पंचायत से संसद तक महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, जिससे नीतियां अधिक समावेशी होंगी।


