संसार में किसी भी प्रकार का विरोध या संघर्ष के पीछे अन्याय, असहनीय अत्याचार एवं जुर्म की दास्तां होती है। संताल हूल उसी दास्तां का एक प्रतिबिम्ब है जो अपने अस्तित्व, सम्मान और अधिकारों के लिए छेड़ा गया जंग है। संताल समुदाय द्वारा किया गया यह क्रान्ति यानि हूल मूलतः उस दमनकारी नीति, जुल्म और शोषण के ख़िलाफ था जो संतालों को शांत, संयमित और सुरक्षित जीवन जीने के रास्ते या तो कांटे बोए जा रहे थे या फिक्र अंग्रेजी हुकूमत जीने के रास्ते बहुत ही संकीर्ण कर रहे थे। 1855 के हूल का उद्देश्य जहां समाज को सामाजिक जीवन में बेहतर बदलाव कर हर तरह से शिक्षा में व्यापक सुधार लाकर आर्थिक और राजनीतिक विकास करना था आज वही परिकल्पना संकीर्ण एवं पूर्वाग्रही मानसिकताओं के कारण वर्ष 2026 के पूर्वार्द्ध तक सफ़ल और सार्थक होने से काफ़ी पीछे है। वर्ष 2000 में अलग झारखंड राज्य बन कर यहां की उच्च शिक्षा की स्थिति में न तो अपेक्षित सुधार है और न ही बदलाव। जबकि शिक्षा ही उज्जवल भविष्य का केंद्र विंदु है। संपूर्ण विकास की धूरी है। विडंबना है कि यहां व्यवस्था विशेष से उच्च शिक्षा तक तथाकथित तथा ओछी मानसिकता वाले लोगों द्वारा जायज़ काम करने वालों को जाति, धर्म के नाम भेद किया जाता है।
उसे झूठी बातों में फंसा कर बदनाम किया जाता है। उसका हक छीना जाता है। पद, पावर और राजनीतिक पहुंच का का ऐसा क्रूर वातावरण निर्मित किया जहां लोग डर के मारे अपने पर होते ज़ुल्म पर भी जुबां से बोल नहीं पाते है। लोग जानकार भी अपनी सुरक्षा को ले विचारों की अभिव्यक्ति से डरते है वहीं मीडिया भी नकारात्मक बातों की टीआरपी बढ़ाने में मस्त एवं व्यस्त दिखती है। सच्चाई और अच्छे कामों को जहां उत्साहवर्धन होना चाहिए, सहयोग और समर्थन किया जाना चाहिए वहां ईर्ष्या का शिकार बनाकर उसके साथ भेदभाव की रणनीति अपनाई जाती है। समाज को इसके लिए भी हूल की जरूरत है जो समानता, पारदर्शिता, स्पष्टता और निष्पक्षता की कसौटी पर कस चलता हो। हूल अस्तित्व के वास्ते जल, जंगल, जमीन, पलायन, विस्थापन, ग़रीबी, बेरोजगारी, भुखमरी के लिए हो जरूरी है साथ ही नैतिकता, उच्च चिंतन, और स्वच्छ विचारों और व्यवहारों को उदित एवं अभिप्रेरित करने वाले संस्कारों एवं सभ्यताओं के लिए भी हो जिससे हूल की सार्थकता सुनिश्चित हो। फलित हो ताकि आने वाला पीढ़ी स्वर्णिम काल का अनुभव कर सके।


