● देवघर के डुमरिया गांव में संताली भाषा और ओलचिकी लिपि को बढ़ावा देने के लिए मुफ्त ट्यूशन की शुरुआत
● सप्ताह में दो दिन चलने वाली इस क्लास में उम्र की कोई सीमा नहीं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी ले रहे हिस्सा
● ‘एक भाषा-एक लिपि’ की तर्ज पर ओलचिकी के संरक्षण पर जोर, छात्रों को मुफ्त बांटी गईं किताबें और कैलेंडर
ब्यूरो
दुमका। झारखंड के देवघर जिले स्थित पालोजोरी प्रखंड के डुमरिया गांव में अपनी मातृभाषा और संस्कृति को सहेजने की एक बेहद खास पहल शुरू की गई है। गांव का संचालन करने वाले ‘आतु मोड़े होड़’ के सहयोग से संताली भाषा और ओलचिकी लिपि को बढ़ावा देने के लिए गांव में मुफ्त ट्यूशन की शुरुआत हुई है। पिछले एक महीने से गांव के ही जय प्रकाश मुर्मू के घर पर यह क्लास चलाई जा रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लिपि से जोड़ना है।
इस ट्यूशन क्लास की सबसे खास बात यह है कि इसमें उम्र की कोई सीमा नहीं रखी गई है। बच्चे, युवा, महिलाएं, पुरुष और यहां तक कि गांव के बुजुर्ग भी एक साथ बैठकर संताली ओलचिकी सीख रहे हैं। वर्तमान में करीब 25 लोग नियमित रूप से इस क्लास का हिस्सा बन रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि यह शिक्षा पूरी तरह से मुफ्त है और डुमरिया के अलावा आसपास के गांवों के लोग भी इसमें शामिल होकर अपनी भाषा सीख सकते हैं।
सप्ताह में दो दिन, बुधवार और रविवार की सुबह यह कक्षाएं आयोजित की जाती हैं। ओलचिकी शिक्षक संजय टुडू सभी विद्यार्थियों और ग्रामीणों को संताली भाषा और ओलचिकी लिपि की प्रारंभिक जानकारी दे रहे हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि संताली भाषा के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग लिपियों के इस्तेमाल से साहित्य और भाषा के आपसी जुड़ाव में दिक्कतें आ सकती हैं। ऐसे में ‘एक भाषा-एक लिपि’ की भावना को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है। उन्होंने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां संताली भाषा की पढ़ाई ओलचिकी माध्यम से ही होती है।
ओलचिकी लिपि के रचयिता पंडित रघुनाथ मुर्मू थे। ग्रामीणों के अनुसार, यह एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित लिपि है, जिसका अपना यूनिकोड मानक भी उपलब्ध है। इससे डिजिटल माध्यमों पर भी संताली भाषा के लेखन, प्रकाशन और प्रसार में काफी सुविधा मिली है।
अपनी भाषा को बढ़ावा देने के इसी अभियान के तहत छात्रों और ग्रामीणों को ओलचिकी सीखने में मदद के लिए किताबें और कैलेंडर भी वितरित किए गए। ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की पहल से बच्चों और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जुड़ने का मौका मिलेगा। इस मौके पर नरसिंह मरांडी, सुशिल मरांडी, हरीश टुडू, मनोज मुर्मू, जयदेव मरांडी, सावन टुडू, बजंती मुर्मू, अन्नू मुर्मू, पूजा मुर्मू, फूलकुमारी मुर्मू, अन्नू मरांडी, रितिका मुर्मू और विनीति मुर्मू समेत कई लोग उपस्थित थे।


