नई दिल्ली । राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी जनवरी-दिसंबर 2025 के वार्षिक असंगठित क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण (एएसयूएसई) के आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। यह सर्वेक्षण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत के शहरी असंगठित क्षेत्र में जहां महिलाओं के स्वामित्व वाले कारोबारों की संख्या अधिक है, वहां महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी तुलनात्मक रूप से बेहतर हैं। हालांकि, इस सकारात्मक प्रवृत्ति के बावजूद, श्रम बल भागीदारी दर और आय के मामले में लैंगिक असमानता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सर्वेक्षण के अनुसार 10 लाख से अधिक आबादी वाले 46 बड़े शहरों में यह गहरा सकारात्मक संबंध देखा गया है। उदाहरण के लिए ग्रेटर विशाखापत्तनम में लगभग 31 फीसदी कारोबार महिलाओं के स्वामित्व में हैं, जिसके परिणामस्वरूप वहां कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 42.5 फीसदी है। इसी तरह, सूरत में 43.2 फीसदी कारोबार महिलाएं चलाती हैं, और वहां कुल कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी 41.4 फीसदी दर्ज की गई है। हालांकि इन आंकड़ों के विश्लेषण से एक दिलचस्प पहलू भी उजागर हुआ है। जिन शहरों की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था विनिर्माण और सेवाओं की बजाय मुख्य रूप से व्यापार पर आधारित है, वहां महिलाओं की भागीदारी सबसे कम है। ऐसे आठ व्यापार-प्रधान शहरों में, महिलाओं की कार्यबल हिस्सेदारी 20 फीसदी से भी कम है।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां केवल 16.2 फीसदी व्यवसाय महिलाओं के स्वामित्व में हैं और कार्यबल में उनकी हिस्सेदारी लगभग 13 फीसदी है। श्रीनगर इस सूची में सबसे नीचे है, जहां महिलाओं के स्वामित्व वाले व्यवसाय केवल 9.9 फीसदी हैं और कार्यबल में उनकी भागीदारी भी लगभग 10 फीसदी ही है। निष्कर्ष बताते हैं कि भले ही 2018 में 19.8 फीसदी रही महिला श्रम बल भागीदारी दर बढ़कर 2025 में 27.2 फीसदी हो गई हो, लेकिन पुरुषों की तुलना में यह अंतर अब भी चिंताजनक है। वेतनभोगी महिलाओं की औसत मासिक आय पुरुषों से लगभग 7,000 रुपये कम है, जबकि स्वरोजगार में यह अंतर 17,000 रुपये तक पहुंच जाता है, जो लैंगिक असमानता की गहरी जड़ों को दर्शाता है।


