नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और आधुनिक जीवनशैली में पीठ दर्द (बैक पेन) और जोड़ों का दर्द (जॉइंट्स पेन) युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है, जिसका एक मुख्य कारण स्ट्रेस है। जब व्यक्ति तनाव में होता है, तो उसका मस्तिष्क खतरे को भांपकर फाइट या फ्लाइट मोड में आ जाता है। इस स्थिति में शरीर में कुछ जैविक और रासायनिक बदलाव होते हैं। तनाव के दौरान शरीर में कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। लंबे समय तक इसका स्तर ऊंचा रहने से शरीर में क्रोनिक इन्फ्लेमेशन (सूजन) बढ़ती है, जो जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द का कारण बनती है। तनाव की स्थिति में शरीर अनजाने में ही अपनी मांसपेशियों को सिकोड़ लेता है। यह लगातार बना रहने वाला खिंचाव मांसपेशियों को थका देता है और दर्द में बदल जाता है, खासकर गर्दन, कंधों और पीठ की मांसपेशियों में। आज की युवा पीढ़ी में पीठ दर्द महामारी की तरह फैल रहा है।
इसका स्ट्रेस से सीधा मेल है। जब युवा काम के दबाव या मानसिक तनाव में होते हैं, तो वे अक्सर अपनी बैठने की मुद्रा (पोस्चर) पर ध्यान नहीं देते। कंधे झुकाकर बैठना या रीढ़ की हड्डी पर अनावश्यक दबाव डालना बैक पेन को जन्म देता है। लगातार स्ट्रेस के कारण रीढ़ की हड्डी के आसपास की रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं। इससे पीठ की मांसपेशियों तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते, जिससे गंभीर बैक पेन होता है। स्ट्रेस सीधे तौर पर हमारे इम्यून सिस्टम को भी प्रभावित करता है। अत्यधिक तनाव के कारण शरीर का इम्यून सिस्टम स्वस्थ टिश्यूज पर ही हमला करने लगता है, जिससे जोड़ों में जकड़न और दर्द (जैसे अर्थराइटिस के लक्षण) बढ़ने लगते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि मानसिक तनाव के कारण मस्तिष्क की दर्द को सहने या प्रोसेस करने की क्षमता कम हो जाती है। यानी, हल्का सा दर्द भी स्ट्रेस की स्थिति में बहुत गंभीर महसूस होता है। इस दर्द के चक्र को तोड़ने के लिए मानसिक और शारीरिक दोनों स्तरों पर काम करना जरूरी है। इसमें स्ट्रेस मैनेजमेंट तकनीकों को अपनाना शामिल है, जैसे ध्यान (मेडिटेशन), गहरी सांस लेने के व्यायाम और योग को दिनचर्या में शामिल करना। शारीरिक गतिशीलता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है; हर 45 मिनट के काम के बाद अपनी सीट से उठें, थोड़ा टहलें और स्ट्रेचिंग करें। पर्याप्त नींद यानी 7-8 घंटे की गहरी नींद शरीर को रिकवर करने और कोर्टिसोल के स्तर को कम करने में मदद करती है। शारीरिक पीड़ा, विशेषकर बैक पेन और जॉइंट्स पेन, अक्सर हमारे भीतर दबे मानसिक तनाव का ही शारीरिक रूप होती है।


