गुवाहाटी । असम के गुवाहाटी स्थित कामाख्या मंदिर एक ऐसा शक्तिपीठ है, जहां देवी की मूर्ति नहीं बल्कि ‘योनि’ स्वरूप की पूजा होती है। नीलांचल पर्वत पर स्थित मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि तंत्र साधना और राजनीति के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
हर वर्ष जून में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला मंदिर की सबसे विशेष परंपरा है। मान्यता है कि इस दौरान देवी ‘रजस्वला’ होती हैं, इसकारण मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद होते हैं। इस अवधि में योनि स्थल को सफेद कपड़े से ढक दिया जाता है, जो बाद में लाल हो जाता है। इस लाल कपड़े की एक-एक कतरन को प्रसाद स्वरूप पाने के लिए श्रद्धालुओं में होड़ मच जाती है।
मंदिर की पूजा पद्धति अन्य मंदिरों से अलग है। यहां दर्शन से अधिक ‘स्पर्श’ का महत्व है। गर्भगृह में स्थित जलयुक्त योनि-कुंड को छूकर भक्त आशीर्वाद पाते हैं। इस जल को पवित्र मानकर लोग अपने साथ घर भी ले जाते हैं और शुभ कार्यों में उपयोग करते हैं। तंत्र परंपरा के कारण यहां साधना करने वाले तांत्रिकों की भी बड़ी संख्या देखने को मिलती है, विशेषकर अंबुबाची मेले के दौरान श्मशान साधना के दृश्य आकर्षण का केंद्र होते हैं।
राजनीतिक दृष्टि से भी मंदिर बेहद प्रभावशाली माना जाता है। ब्रह्मपुत्र घाटी के जिन क्षेत्रों में असम की अधिकांश विधानसभा सीटें आती हैं, वहां इस मंदिर का गहरा सांस्कृतिक प्रभाव है। इसकारण चुनावी मौसम में विभिन्न दलों के नेता यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठान करवाते हैं।
हाल के वर्षों में कई बड़े राजनीतिक चेहरे, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह और दिग्गज कारोबारी मुकेश अंबानी यहां दर्शन कर चुके हैं। कांग्रेस नेता और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और भाजपा से जुड़े नेता भी हाल के महीनों में यहां अनुष्ठान कराते दिखाई दिए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, कामाख्या मंदिर असम के लगभग 65 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं की सांस्कृतिक आस्था का केंद्र है। इसके बाद यहां उपस्थिति दर्ज कराना नेताओं के लिए केवल धार्मिक नहीं, बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखता है। इसे चुनावी ‘शुभारंभ स्थल’ के रूप में भी देखा जाने लगा है।
ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह मंदिर महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि 8वीं-9वीं शताब्दी में इसका निर्माण हुआ था, जिसे बाद में आक्रमणों में क्षति पहुंची। बाद में कोच राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण कराया। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह वही स्थान है जहां देवी सती का योनि भाग गिरा था, जिससे यह शक्तिपीठ बना।
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