निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या से बढ़ी चिंता
नई दिल्ली । देश की शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव और चुनौती के दौर से गुजर रही है। पिछले एक दशक में जहां लगभग 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हो गए, वहीं 50 हजार से अधिक निजी स्कूलों का खुलना शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते असंतुलन की ओर इशारा करता है। यह स्थिति खासतौर पर गरीब और वंचित वर्गों के बच्चों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। जानकारों की मानें तो अनुच्छेद 21ए के तहत हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त है, लेकिन मौजूदा हालात में यह अधिकार कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 में सरकारी स्कूलों की संख्या 11 लाख से अधिक थी, जो 2023-24 तक घटकर करीब 10.17 लाख रह गई। वहीं निजी स्कूलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
ग्रामीण भारत पर सबसे ज्यादा असर इस बदलाव का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में हजारों सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। इससे गरीब परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुंच और अधिक कठिन हो गई है। स्कूल मर्जर नीति बनी वजह विशेषज्ञों के अनुसार, ‘स्कूल मर्जर नीति’ इस संकट का एक प्रमुख कारण है। कम नामांकन वाले छोटे स्कूलों को बड़े स्कूलों में मिलाने की इस नीति के कारण बच्चों को दूर-दराज के स्कूलों तक जाना पड़ता है, जिससे कई बार वे पढ़ाई छोडऩे पर मजबूर हो जाते हैं।
संरचना और संसाधनों की कमी सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, कमजोर आधारभूत संरचना और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में कमी भी नामांकन घटने के प्रमुख कारण हैं। मिड-डे मील जैसी योजनाएं भी कई जगहों पर अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पा रही हैं। नई शिक्षा नीति का प्रभाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के कुछ प्रावधान, जैसे एकल शिक्षक स्कूलों को हतोत्साहित करना, भी इस बदलाव को प्रभावित कर रहे हैं। इसके चलते कई छोटे स्कूलों का विलय या बंद होना तेज हुआ है। निजीकरण से बढ़ती असमानता सरकारी स्कूलों की संख्या घटने के साथ ही निजी स्कूलों की ओर रुझान बढ़ा है। हालांकि, ऊंची फीस के कारण गरीब परिवारों के लिए यह विकल्प आसान नहीं है। ऐसे में शिक्षा में असमानता बढऩे का खतरा और गहरा होता जा रहा है।


