पटना । राजधानी पटना से करीब 100 किलोमीटर दूर मोकामा विधानसभा क्षेत्र फिर हत्या, जातीय समीकरण और बाहुबल की सियासत के कारण सुर्खियों में है। जन सुराज समर्थक नेता दुलारचंद यादव की हत्या ने पूरे बिहार के राजनीतिक माहौल को हिला दिया है। हत्या का आरोप जेडीयू उम्मीदवार और बाहुबली अनंत सिंह पर लगा है, जबकि अनंत ने इसके पीछे अपने पुराने विरोधी बाहुबली सूरजभान सिंह का हाथ बताया है।
दुलारचंद, जो कभी लालू यादव के करीबी थे, वर्तमान में अनंत सिंह से दूरी बनाकर जन सुराज के पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में थे। टाल क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ थी, और वहीं गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। इस वारदात ने न केवल मोकामा की बल्कि पूरे बिहार की राजनीति में तनाव बढ़ा दिया है।
मोकामा की सियासत पिछले 35 वर्षों से कुछ चुनिंदा बाहुबली परिवारों के बीच सिमटी रही है। 1990 में अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह पहली बार जनता दल से विधायक बने। 1995 में उन्होंने फिर जीत हासिल की, लेकिन 2000 में उन्हें सूरजभान सिंह ने हरा दिया। इसके बाद 2005 में अनंत सिंह ने जेडीयू के टिकट पर पहली बार विधानसभा में कदम रखा। 2005 से 2020 तक वह लगातार चुनाव जीतते रहे, तीन बार जेडीयू से, एक बार निर्दलीय और 2020 में आरजेडी के टिकट पर जीत हासिल की। 2022 में सजा होने के बाद उनकी सदस्यता रद्द हुई, तब उनकी पत्नी नीलिमा देवी उपचुनाव जीतकर विधायक बनीं। अब अनंत सिंह एक बार फिर जेडीयू से चुनावी मैदान में हैं।
मोकामा विधानसभा क्षेत्र में लगभग 30 प्रतिशत आबादी भूमिहार समुदाय की है, जो इस सीट पर लगातार निर्णायक भूमिका निभाती आई है। 1952 से लेकर अब तक हर विधायक भूमिहार समाज से ही रहा है, जगदीश नारायण सिंह से लेकर अनंत सिंह तक।
हालाँकि यादव समुदाय, जिसकी हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है, लगातार भूमिहार वर्चस्व को चुनौती देता रहा है। 90 के दशक में लालू यादव के उदय के साथ ही दुलारचंद का नाम उभरा, जिन्होंने यादव, ओबीसी और दलितों के गठजोड़ से ‘भूमिहार राजनीति’ को चुनौती देने की कोशिश की।
मोकामा की वर्तमान लड़ाई पूरी तरह अनंत बनाम सूरजभान के बीच है। सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी आरजेडी उम्मीदवार हैं, जो पहले मुंगेर से एलजेपी सांसद रह चुकी हैं। दोनों ही उम्मीदवार भूमिहार समाज से आते हैं और अपने-अपने वर्ग में गहरी पैठ रखते हैं। 2020 में अनंत सिंह ने आरजेडी से जीत हासिल की थी, जबकि सूरजभान गुट के ललन सिंह (लोजपा) ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। इस बार वही संघर्ष एक नए रूप में दोहराया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मोकामा की राजनीति, बिहार के उस पुराने दौर की झलक देती है, जहाँ जात और जोर दोनों ही सत्ता की कुंजी थे। इस बार दुलारचंद की हत्या ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है क्या मोकामा में विकास, शिक्षा और रोजगार पर बात होगी, या सियासत फिर से बाहुबल और बदले की राजनीति में उलझकर रह जाएगी?
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