डिजिटल सुविधाओं की स्थिति भी कमजोर, शिक्षा बजट में भी आई कमी
नई दिल्ली । कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने हाल ही में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया है। इस अभियान के जरिए ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में खराब बुनियादी ढांचे, शिक्षकों और सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों को उठाया। अभियान में सरकारी स्कूलों की घटती संख्या, छात्रों के नामांकन में गिरावट और निजी स्कूलों पर बढ़ती निर्भरता को उजागर किया गया है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 8 सालों में भारत में स्कूलों की संख्या में कमी आई है। इसी दौरान छात्रों के नामांकन में भी गिरावट आई, हालांकि छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार हुआ है। देश में 2018-19 में स्कूलों की कुल संख्या 15.5 लाख थी, जो 2025-26 में घटकर 14.6 लाख रह गई। छात्रों के नामांकन में भी कमी आई है। छात्रों का नामांकन 2018-19 में 26 करोड़ से घटकर 2025-26 में यह 24.7 करोड़ रह गया है।
वहीं, छात्र-शिक्षक अनुपात 2018-19 में 27 छात्रों पर एक शिक्षक से सुधरकर 2025-26 में 24 छात्रों पर एक शिक्षक हो गया है। यह सुधार मुख्य रूप से छात्रों की संख्या घटने की वजह से हुआ है, न कि शिक्षकों की संख्या बढ़ने के कारण। 2025-26 में करीब 31 फीसदी पात्र बच्चों का स्कूलों में नामांकन नहीं था यानी 3 से 17 साल की आयु के करीब 11.1 करोड़ बच्चे स्कूल शिक्षा से बाहर थे। यह स्थिति पिछले 8 सालों से बनी हुई है। अधिकांश सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। करीब 99 फीसदी सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा, 94 फीसदी में बिजली और 96 फीसदी में शौचालय उपलब्ध हैं।
हालांकि, डिजिटल सुविधाओं के मामले में स्थिति अभी कमजोर है। केवल 25 फीसदी स्कूलों में कंप्यूटर, 16 फीसदी में प्रोजेक्टर और 6 फीसदी स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी हैं। सरकारी स्कूलों की संख्या में आई गिरावट के साथ शिक्षा बजट में भी कमी आई है। कुल केंद्रीय बजट में स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2010 में 1.9 फीसदी थी, जो घटकर वित्त 2026 में 1.4 फीसदी रह गई है।


