अंतरराष्ट्रीय मूलवासी व आदिवासी दिवस पर विशेष रिपोर्ट
एस.के. झा. सुमन
दुमका। दुनियाभर में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोगों की संस्कृति, भाषा और अस्तित्व को बचाने के लिए हर साल 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाया जाता है। बता दें कि दुनिया में कुल आदिवासियों की संख्या करीब 37 करोड़ है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं। आदिवासी समुदाय के लोग आज भी समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हुए हैं, जिसके चलते ये आज भी काफी पिछड़े हुए हैं। हालांकि विभिन्न सरकारों और संगठनों द्वारा आदिवासियों के उत्थान के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं।
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विश्व आदिवासी दिवस का क्या है इतिहास
इस दिन को मनाने की शुरुआत एक विश्वव्यापी आंदोलन से हुई है ।जिसका उद्देश्य आदिवासी लोगों के अधिकारों और महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताओं को मान्यता देना है। दुनिया भर की आबादी में लगभग 6 फिसद हिस्सा होने के बावजूद, आदिवासी समुदाय अक्सर हाशिए पर रहते हैं, इस तथ्य के बावजूद कि उनके पास समृद्ध सांस्कृतिक विविधता है।आदिवासी अधिकारों का सम्मान करने के लिए इस दिन को मनाने का विचार संयुक्त राष्ट्र के भीतर शुरू हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य इन लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना था कि उनकी आवाज़ को दुनिया भर में मान्यता मिले। दिसंबर 1994 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विश्व के आदिवासी लोगों के वैश्विक दिवस को समझने और मान्यता देने के लक्ष्य को अपनाया।
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झारखंड में आदिवासी की क्या है स्थिति
भारत के झारखंड राज्य में 26 फीसदी आबादी आदिवासी है। झारखंड में 32 आदिवासी जनजातियां रहती हैं, जिनमें बिरहोर, पहाडिय़ा, माल पहाडिय़ा, कोरबा, बिरजिया, असुर, सबर, खडिय़ा और बिरजिया जनजाति समूह हैं। देश की आजादी के समय झारखंड में आदिवासी जनजाति के लोगों की संख्या 35 फीसदी के करीब थी, जो कि 2011 की जनगणना के अनुसार, 26 फीसदी रह गई है।
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विश्व के स्वदेशी लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस 2024 की थीम
यह दिन आदिवासी समाज को संरक्षित करके उन्हे उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम करता है। आदिवासी दिवस वैश्विक स्तर पर हर साल एक नई थीम के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष आदिवासी दिवस 2024 की थीम ‘स्व-निर्णय के लिए परिवर्तन के एजेंट के रूप में स्वदेशी युवा’ पर रखी गई है। इस थीम का उद्देश्य युवाओं को समाज में परिवर्तन करने के लिए प्रेरित करना और स्वदेशी युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर को लेकर केंद्रित है ।
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दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक स्वदेशी लोग अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में करते हैं काम
स्वदेशी लोगों के माध्यम से विश्व की लगभग 7,000 भाषाओं में से अधिकांश भाषाएं बोली जाती हैं और वे 5,000 विभिन्न संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, आज भी दुनिया भर में, रोजगार में लगे सभी स्वदेशी लोगों में से 47 फीसदी के पास कोई शिक्षा नहीं है, जबकि उनके गैर-स्वदेशी समकक्षों में से यह आंकड़ा 17 फीसदी का है। महिलाओं के लिए तो यह अंतर और भी बड़ा है। दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक स्वदेशी लोग अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करते हैं, जबकि उनके गैर-स्वदेशी समकक्षों की संख्या 66 फीसदी है। अपने गैर-स्वदेशी समकक्षों की तुलना में स्वदेशी लोगों के अत्यधिक गरीबी में रहने के आसार लगभग तीन गुना है। दुनिया भर में लगभग 47.6 करोड़ मूलनिवासी लोग 90 देशों में रहते हैं। वे दुनिया की आबादी का पांच प्रतिशत से भी कम हैं, लेकिन सबसे गरीब लोगों में उनका हिस्सा 15 प्रतिशत है।


