डॉ होलिका कुमारी मरांडी,
सहायक अध्यापक, संथाली विभाग, संताल परगना महाविद्यालय दुमका।
बात जब भी आदिवासी समाज की आती है, तब उसके मस्तिष्क पटल पर एक विशिष्ट परंपरा और संस्कृति की छाप दृष्टिगोचर होता है। चुकी आदिवासी मूलत: प्रकृति- प्रेमी होते हैं। प्रकृति की शांत और निश्छल गोद में पलने वाले इस समुदाय की अपनी विशेषताएं हैं । इस समुदाय की पहचान उनकी भाषा संस्कृति इनकी जीवन शैली, वस्त्र आभूषण और उनके पर्व त्योहार में झलकता है। आदिवासी समुदाय प्रकृति के सभी घटकों पेड़, पौधे,धरती, नदियों, पहाड़ों और सूर्य की पूजा अर्चना करते हैं । उनकी परंपरा और संस्कृति अपने आप में बड़ा ही अनूठा और समृद्ध है। बात अगर आदिवासी शब्द की उत्पत्ति का किया जाए तो यह दो शब्द आदि और वासी से मिलकर बना जिसका अर्थ होता है आदिकाल से इस देश में निवास करने वाला। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदाय में गोंड, मुंडा, हो, संताल, खडिय़ा, उरांव, बोडो,कोल, भूमिज , बिरहोर, असुर और मीणा आदि है। भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति शब्द का उपयोग किया गया है । भारत में आदिवासियों का निवास स्थान मुख्य रूप से उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, अंडमान -निकोबार, सिक्किम, त्रिपुरा,मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड और असम है। आदिवासी समुदाय दुनिया में अपने विशिष्ट परंपरा और एवं संस्कृतियों के लिए जाना जाता है। बाकी समुदाय से उनकी परंपरा ही उन्हें अलग पहचान दिलाती है लेकिन आधुनिक काल में बाह्य संपर्क में आने के फलस्वरुप इन्होंने हिंदू, ईसाई एवं इस्लाम धर्म को भी अपनाया है। अंग्रेजी राज्य के दौरान बड़ी संख्या में ये ईसाई बने तो आजादी के बाद उनकी हिंदुकरण का प्रयास तेजी से हुआ है। जिससे उनके परंपरा और संस्कृति पर काफी प्रभाव पड़ा है वर्तमान में अगर आदिवासियों की परंपरा या संस्कृतियों को नजदीक से देखा जाए तो काफी बदलाव नजर आता है । सोशल मीडिया के इस दौर में सबसे अधिक प्रभाव लोक संगीत पर देखने को मिलता है। पहले लोकगीत परंपरागत वाद्य यंत्रों के साथ गया जाता था ,परंतु वर्तमान में आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ संगीतबद्ध किया जा रहा है। जिससे लोक गीतों का मूल सुरताल आधुनिक वाद्य यंत्रों से कौन होता जा रहा है भले ही यह युवा वर्गों को आकर्षित करता हो परंतु पुरानी पीढ़ी के लिए यह कर्णप्रिय नहीं है ।ऐसी स्थिति में दोनों पीढियों के बीच वैचारिक द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न होती है। इसके अलावा विवाह का स्वरूप भी बदल रहा है वर्तमान में आदिवासी समुदाय अधिक मुख्य धारा से जुड़ रहे हैं यह आदिवासियों के लिए एक सकारात्मक संकेत है लेकिन बाकी गैर समुदायों के बीच रहकर इनमें आधुनिकता का प्रभाव हावी होते नजर आ रहा है शहर हो या गांव विभाग के स्वरूप में आधुनिकता कर प्रभाव पड़ा है। आदिवासी परंपराओं को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारण औद्योगिकरण भी है वर्तमान में औद्योगिक विकास के लिए खनिज, संपदा और जंगल, पहाड़ के इलाकों में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी माना जा रहा है और यह सारी संपदा इन्हीं आदिवासी क्षेत्रों में उपलब्ध है। इससे हम आदिवासी समूह को मानवीय अधिकारों एवं समुचित अभिरक्षा किए बिना क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हितों के लिए उन्हें जबरन विस्थापित कर उनकी अपनी जीवन-शैली, समाज -संरचना, सांस्कृतिक मूल्यों से वंचित किया जा रहा है । जिससे सामाजिक संरचना बिगड़ते जा रही है और ऐसे में परंपरा के निर्वहन में काफी प्रभाव पड़ रहा है। देखा जाए तो आदिवासी परंपरा के इतिहास में बिखराव का मुख्य कारण आधुनिक संस्कृति और औद्योगिकरण का प्रभाव है । जिससे आदिवासी समुदाय को सचेत होने एवं अपनी परंपराओं को संवेग रखने की आवश्यकता है क्योंकि आदिवासियों की पहचान ही उनकी परंपरा और उनकी संस्कृति है।


