प्रो. निर्मल मुर्मू
एसपी कॉलेज दुमका
कहते हैं कि जल, जंगल और जमीन असली मालिक आदिवासी हैं। प्राकृतिक के साथ उनका घनिष्ठ रिश्ता है। प्राकृतिक के गोद में पला बढ़ा आज भी उन्हें शहर के आधुनिक चकाचौंध दुनिया से बेहतर गांव की संस्कृति पसंद है। आप कह सकते हैं कि आदिवासी और प्राकृति दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। आज जहां विकास के नामों पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई हो रही है, जंगलों को उजाड़ा जा रहा है वहीं यह समाज प्राकृति को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। चिपको आंदोलन और हंस देव बचाओ आंदोलन इसका जीता जाता उदाहरण है। लेकिन आज हालात बेकाबू हो चुका है, न जंगल बच रहा है और न आदिवासी सुरक्षित है। सृष्टि का यह दोनों रूप अपने-अपने जगह पर अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। पेड़ों की कटाई होती है, जंगल उजाड़ रहा है, यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन आदिवासी समाप्त हो रहा है शायद आपको यह शब्द अटपटा सा लगता होगा।
और मैं यह बात क्यों कह रहा हूं, जानकार आप भी हैरान हो जाएंगे। भारत देश सन् 1947 में आजाद हुआ और 1951 में पहली बार जनगणना हुआ और अंतिम जनगणना सन 2011 में हुआ है। महज 60 वर्षों के अंदर एकीकृत झारखंड में आदिवासियों की जनसंख्या 10त्न घट गई है। आइए हम उसको और आसानी से समझने की कोशिश करते हैं। देश में पहली जनगणना 1951 में हुआ और उसमें एकीकृत झारखंड में रहने वाले आदिवासियों की जनसंख्या लगभग 36त्न था, वहीं यह जनसंख्या 1991 के जनगणना में 27.66त्न घटकर रह गई। सन् 2001 के जनगणना अनुसार 26.30त्न हो गई और अंतिम जनगणना 2011 में आदिवासियों की कुल जनसंख्या 26.11त्न रह गई है। महज 60 वर्षों के अंदर आदिवासीयों की जनसंख्या 10त्न घट गई है। कोविड-19 के कारण 2021 में जनगणना नहीं हो पाई यदि होती तो यह आंकड़ा और भी घट सकती थी। इसमें सबसे बदतर हालत आदिम जनजातियों की है, जहां 2001 की जनगणना में आदिम जनजातियों का जनसंख्या लगभग 3,87000 थी, वही 2011 के जनगणना में यह जनसंख्या घटकर 2,92000 दो हो गई। कई आदिम जनजाति समुदाय संकट से जूझ रहा है, वह अस्तित्व के अंतिम सांसें गिन रहा है। संताल परगना में माल पहाडिय़ा बहुतायत की संख्या में थे, लेकिन आज बहुत कम संख्या में रह गई हैं। वहीं झारखंड में असुर जनजातियों की जनसंख्या लगभग 10000 के आसपास रह गई है। जिस तेजी के साथ आदिवासियों की जनसंख्या घटती जा रही है। आने वाला दिनों के लिए शुभ संकेत नहीं है। पहले तो सभी आदिवासी समुदाय को मिलकर इसमें गहरी चिंतन और मनन करना चाहिए। अन्यथा इन्हें दुर्लभ प्रजाति घोषित करने से कोई रोक नहीं सकता है। आदिवासियों का जनसंख्या घटने का कई कारण हो सकता है। पलायन, विस्थापन के साथ-साथ अत्यधिक मृत्यु दर भी उसका एक कारण माना जा सकता है।
विकास के पथ में मदिरापान उसका बहुत बड़ा बाधक है। इसके साथ ही आदिवासियों को धर्म कोड नहीं दिया जाना सबसे बड़ा कारण हो सकता है, क्योंकि हमारा देश में जनगणना का आंकड़ा धार्मिक रूप से दिया जाता है। आज के दौर में आदिवासी बिखराव है धार्मिक रूप से विभाजित है और अशिक्षित भी है। जनगणना के समय इनका जनगणना हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि में गणना किया जाता है। परिणाम स्वरूप हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि की जनसंख्या में तो वृद्धि होती है लेकिन आदिवासियों की जनसंख्या में कमी नजर आने लगती है। इसके साथ ही आदिवासी समुदाय के युवक युवती गैर आदिवासी समुदाय के साथ वैवाहिक संबंध बनाने के बाद धार्मिक, जातीय और सामुदायिक रूप से आदिवासी समाज दूरी बना लेते है, जिसका प्रभाव जनगणना के समय भी दिखता है। आदिवासियों की जनसंख्या में कमी तो हुई है, लेकिन उसके विपरीत आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी जनसंख्या आनुपातिक रूप से अत्यधिक वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए यदि हम संताल परगना की बात करें तो यहां एसपीटी एक्ट जैसा कड़ा कानून आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए बनाया गया है, लेकिन नियमों को ताक में रखकर आदिवासियों का जमीन इन दोनों धड़ल्ले से खरीद-बिक्री हो रही है। आदिवासियों का जमीन में अवैध रूप से बाहरी लोग दुकान, मकान और बड़े-बड़े कारोबार स्थापित करके जनसंख्या को सुगमता से आगे बढ़ा रहे हैं। यह जनसंख्या आदिवासियों की जनसंख्या के विपरीत गणना होती है जो आदिवासियों की जनसंख्या पर हावी हो जाती है। इससे इतर सरकार आदिवासियों के उत्थान और विकास के लिए कई सारे योजनाएं चल रही है, लेकिन उसका कोई फायदा होती हुई नजर नहीं आ रही है।
अगर समय रहते आदिवासियों की जमीन और जनसंख्या को सुरक्षित रखने के लिए कोई कड़ा कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले दिनों में आदिवासी समुदाय को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। भारत में आदिवासियों की स्थिति और हालात से संबंधित समीक्षा और परिचर्चा के लिए प्रत्येक साल 9 अगस्त को आदिवासी दिवस मनाया जाता है, लेकिन उसके नाम पर केवल और केवल खानापूर्ति होता है। ढोल, नगाड़ा और बांसुरी तो खूब बजता है, लेकिन हर बार उसका मुद्दा गौन हो जाता है।


