●भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिकता के संगम से बनेगी नई शिक्षा व्यवस्था : ब्रह्मा जी राव
● मातृभाषा में शिक्षा और कौशल विकास से आत्मनिर्भर बनेंगे विद्यार्थी
● शिक्षा राष्ट्र निर्माण की रीढ़, एनईपी 2020 से चरित्र और संस्कार को मिलेगा बल
दुमका। विद्या भारती विद्यालय सरस्वती शिशु विद्या मंदिर, दुमका में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन और उसके दूरगामी प्रभावों पर विद्वत गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला संघचालक गणेश जिंदल ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में विद्या भारती के राष्ट्रीय मंत्री ब्रह्मा जी राव उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती एवं भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन और वंदना के साथ हुआ। विद्यालय के प्रधानाचार्य कुमार विमलेश ने अतिथियों का परिचय कराया। विद्यालय के सचिव डॉ. सूरज केसरी ने सभी गणमान्य अतिथियों को अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया।
विद्यालय के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र पांडे ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 विद्यार्थियों के समग्र व्यक्तित्व निर्माण, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रबोध को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि विद्या भारती ऐसी शिक्षा व्यवस्था की पक्षधर रही है, जो विद्यार्थी के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के विकास में भी योगदान दे।
गोष्ठी में विषय प्रवेश करते हुए श्री नृपेंद्र पाठक ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मूल अवधारणा, पृष्ठभूमि और उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। प्रो. अनहद लाल ने कहा कि नई शिक्षा नीति की सफलता शिक्षकों के समर्पण, नवाचार और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों को अपनाने पर निर्भर करेगी। अरुण कुमार सिन्हा ने शिक्षा व्यवस्था को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने पर जोर दिया।
सेवानिवृत्त पोस्टमास्टर मनोज साह ने कहा कि नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों के मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास को केंद्र में रखती है। भारत विकास परिषद के सदस्य मधु कुमार सिंह ने विद्यालयी स्तर पर कौशल विकास और व्यावहारिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। अमरेंद्र सुमन ने भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे।
मुख्य वक्ता ब्रह्मा जी राव ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 महज पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं है, बल्कि भारतीय चिंतन, संस्कृति और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की व्यापक पहल है। उन्होंने कहा कि शिक्षा को रटने की प्रणाली से बाहर निकालकर आलोचनात्मक सोच, शोध और प्रयोगात्मक अधिगम से जोड़ना आवश्यक है। मातृभाषा एवं स्थानीय भाषा में प्रारंभिक शिक्षा को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे बच्चों की समझ और सीखने की क्षमता को मजबूती मिलती है। उन्होंने विद्यालयी शिक्षा के साथ कौशल विकास को जोड़ने पर जोर देते हुए कहा कि इससे युवा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे।
अध्यक्षीय संबोधन में गणेश जिंदल ने कहा कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण की रीढ़ है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण, संस्कार और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कार्यक्रम में राजेंद्र सोरेन, शिवाकांत हुसैन त्रिपाठी, डॉ. अमूल्य पाल, अश्वनी कुमार, शिव शंकर गुप्ता, नेहा सिंह, अमित कुमार, अमित पांडेय, अंजनी शरण, अमरेंद्र सुमन, जिला स्कूल के सेवानिवृत्त एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित दिलीप झा, दुमका मेडिकल कॉलेज के डॉ. पीयूष रंजन, पूनम भगत, केके सरकार, अशोक सिंह समेत बड़ी संख्या में विद्वान, शिक्षक एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
अंत में विद्यालय के सचिव डॉ. सूरज केसरी ने अतिथियों एवं उपस्थित प्रबुद्धजनों के प्रति आभार व्यक्त किया। सामूहिक शांति मंत्र के पाठ के साथ विद्वत गोष्ठी का विधिवत समापन हुआ।


