मासधारी गांव में आज भी नहीं पहुंचती एंबुलेंस, ग्रामीणों ने प्रशासन से की सड़क निर्माण की मांग
संताल एक्सप्रेस
दीपक मंडल

लिट्टीपाड़ा (पाकुड़)। विकास के तमाम दावों के बीच लिट्टीपाड़ा प्रखंड का मासधारी गांव आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। गांव तक सड़क नहीं होने का खामियाजा ग्रामीणों को आपातकालीन परिस्थितियों में भुगतना पड़ रहा है। इसका ताजा उदाहरण उस समय देखने को मिला, जब प्रसव पीड़ा से कराह रही एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिजनों और ग्रामीणों को खटिया का सहारा लेना पड़ा। महिला को खटिया पर लिटाकर कंधों के सहारे करीब चार किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया। इसके बाद उसे अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की गई।
जानकारी के अनुसार मासधारी गांव निवासी बागी पहाड़िन (25), पति पिरका पहाड़िया को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। महिला की हालत को देखते हुए परिजनों ने तत्काल अस्पताल पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस वहां नहीं पहुंच सकी। ऐसे में ग्रामीणों ने मिलकर खटिया की व्यवस्था की और महिला को उस पर लिटाकर बारी-बारी से कंधों पर उठाते हुए मुख्य सड़क तक ले गए। इस दृश्य ने एक बार फिर गांव में बुनियादी सुविधाओं की बदहाली को सामने ला दिया है।ग्राम प्रधान बैदा पहाड़िया के अनुसार, मासधारी गांव से मुख्य सड़क की दूरी लगभग चार किलोमीटर है। पूरे रास्ते में सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों को आवागमन में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। किसी व्यक्ति के बीमार पड़ने, दुर्घटना होने या गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने की नौबत आने पर खटिया ही एकमात्र सहारा बनती है। उन्होंने बताया कि यह समस्या किसी एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव के सभी लोग इससे प्रभावित हैं।ग्रामीणों का कहना है कि सड़क के अभाव में गांव तक न तो एंबुलेंस पहुंच पाती है और न ही अन्य चारपहिया वाहन। सबसे अधिक परेशानी गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को होती है। आपात स्थिति में मरीज को मुख्य सड़क तक पहुंचाने में ही काफी समय लग जाता है, जिससे समय पर इलाज मिलने में भी बाधा उत्पन्न होती है।ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से मासधारी गांव तक सड़क निर्माण कराने की मांग की है। उनका कहना है कि सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि आपातकाल में जीवन बचाने का जरिया भी है। आज भी यदि किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए खटिया पर ढोना पड़े, तो यह ग्रामीण विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। ग्रामीणों को अब प्रशासनिक पहल का इंतजार है, ताकि आने वाले दिनों में किसी मरीज को इस तरह की परेशानी से नहीं गुजरना पड़े।



