गया । बिहार के गया की सदियों पुरानी बांस कला, जो आधुनिकता और प्लास्टिक के बढ़ते प्रचलन से जूझ रही थी, इस बांस कला को छठ महापर्व हर साल एक नया जीवन देता है। जहाँ आम दिनों में बांस से बने सूप, दउरा और टोकरियों की मांग घटती जा रही है, वहीं छठ आते ही इन पारंपरिक उत्पादों की बिक्री में अचानक भारी उछाल आ जाता है। यह पर्व कारीगरों के लिए केवल आस्था का नहीं, बल्कि साल की सबसे बड़ी कमाई का जरिया बन जाता है।
गया के बाराचट्टी, शेरघाटी और फतेहपुर जैसे क्षेत्रों के कई गांवों में, विशेषकर हेहेसारी में तुरी समाज के 40 से अधिक परिवार इन दिनों दिन-रात बांस के सामान बनाने में जुटे हैं। कई कारीगर जो साल के दूसरे समय में मजदूरी के लिए बाहर चले जाते हैं, वे छठ से डेढ़-दो महीने पहले गांव लौट आते हैं ताकि इस पुश्तैनी काम में हाथ बंटा सकें। पुरुषों के साथ महिलाएं भी बांस काटने, चीरने और बुनने में सक्रिय रूप से सहयोग करती हैं।
दो माह की यह कड़ी मेहनत एक परिवार को 50 से 70 हजार तक, और कुछ को डेढ़ लाख रुपये से भी अधिक की आमदनी देती है। सुनीता जैसी कई कारीगरों ने इसी कमाई से अपने कच्चे घर पक्के कराए हैं और बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित की है। उनके लिए यह कला केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि परिवार के पालन-पोषण का आधार है।
बांस की आपूर्ति झारखंड के ईसरी बगोदर और गिरिडीह जैसे इलाकों से होती है, जहाँ एक बांस की कीमत करीब 500 रुपये तक पड़ती है। एक बांस से छोटे आकार के करीब 40 तक सामान तैयार हो सकते हैं, लेकिन यह काम आसान नहीं है। एक कुशल कारीगर भी दिनभर में औसतन तीन-चार सूप से ज्यादा नहीं बना पाता। बाजार में सूप 80 से 150 रुपये और दउरा 250 से 400 रुपये में बिकता है। रंगीन और डिजाइन वाले सामानों की कीमत अधिक होती है, जिनकी मांग शादी-ब्याह के सीजन में बढ़ती है, जबकि छठ में पारंपरिक और बिना रंग वाले उत्पादों को प्राथमिकता दी जाती है।
एक दशक पहले तक सालभर होने वाली बिक्री अब प्लास्टिक और फाइबर के विकल्पों के कारण सिकुड़ गई है, लेकिन छठ और लग्न के समय मांग में 20 गुना तक उछाल आता है। ग्रामीण बाजारों में दुकान लगाने वाले संजीत कुमार जैसे व्यापारी छठ 2026 की तैयारी बहुत पहले से शुरू कर देते हैं। गया में तैयार ये बिहारी सूप और दउरा न केवल स्थानीय बाजारों, बल्कि दूसरे राज्यों और विदेशों में रह रहे प्रवासी परिवारों तक भी पहुँचते हैं, जिससे इन्हें एक वैश्विक पहचान मिलती है।
बाराचट्टी विधायक ज्योति देवी के अनुसार, क्षेत्र में एक हजार से अधिक परिवार इस काम से जुड़े हैं। पिछले साल गया जिले में बांस से बने सामानों का अनुमानित कारोबार करीब 1.5 करोड़ रुपये रहा था। इस बार मलमास के कारण नए खरीददारों पर थोड़ा असर होने की आशंका है, लेकिन पहले से छठ कर रहे परिवारों की खरीदारी जारी है। खरीदार बताती हैं कि उनके लिए बांस के सामान सिर्फ पूजा सामग्री नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और प्राकृतिक जुड़ाव का प्रतीक हैं। इस प्रकार, छठ महापर्व ने गया की सदियों पुरानी बांस कला को लुप्त होने से बचा रखा है। यह पर्व आस्था, परंपरा और रोजगार के एक सुंदर संगम के रूप में हजारों कारीगर परिवारों को बांस से जुड़े रहने की वजह देता है, जिससे हर साल छठ आते ही गया के गांवों में बांस की खड़खड़ाहट और सूप-दउरा की बुनाई फिर से तेज हो जाती है।




