देवघर। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान देवघर में कार्यरत डॉ. परशुराम तिवारी ने कहा कि जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व नहीं, बल्कि सत्य, धर्म, कर्म और जीवन-दर्शन का संदेश देने वाला पर्व है। श्रीकृष्ण का जन्म अत्यंत विषम परिस्थितियों में हुआ। माता देवकी कारागार में बंद थीं और पिता वसुदेव के हाथों में बेड़ियां थीं। इसके बावजूद वसुदेव की निर्मल नियत और दृढ़ संकल्प ने परिस्थितियों को बदलने का मार्ग बनाया। डॉ. तिवारी ने कहा कि जन्माष्टमी को नियत और नियति का व्रत कहना सार्थक है। नियत मनुष्य की भावना, उद्देश्य और संकल्प है, जबकि नियति जीवन की दिशा और परिणाम। श्रीकृष्ण के जीवन से सीख मिलती है कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों, सही नियत और श्रेष्ठ कर्म से जीवन की दिशा बदली जा सकती है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से कर्म और कर्तव्य का संदेश दिया। जन्माष्टमी का व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि अहंकार, लोभ, क्रोध और द्वेष त्यागकर प्रेम, करुणा, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प भी है। डॉ. तिवारी ने कहा कि 4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाते हुए लोगों को मन, वाणी और कर्म से भगवान श्रीकृष्ण के आदर्शों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। नियत पवित्र, कर्म श्रेष्ठ और जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित हो, यही जन्माष्टमी की वास्तविक सार्थकता है।
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