नई दिल्ली । भारत में ई20 पेट्रोल की आवश्यकता को पूरा करने के लिए सरकार की नई इथेनॉल खरीद नीति का असर अब खेती, पशुओं के चारे और रोजमर्रा की खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इस नीति का उद्देश्य ऊर्जा जरूरतों और खाद्य महंगाई के बीच संतुलन बनाना है, लेकिन इससे कुछ क्षेत्रों में लागत बढ़ने की आशंका है। खासकर, मक्का का उपयोग इथेनॉल बनाने में बढ़ने से अंडे और चिकन जैसी प्रोटीन युक्त वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
नई नीति के तहत, तेल कंपनियों ने 2026-27 के सप्लाई वर्ष के लिए लगभग 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने के लिए बोलियां आमंत्रित की हैं। हालांकि, इस नए टेंडर में गन्ने के रस, सिरप और बी-हैवी मोलासेस से बनने वाले इथेनॉल को शामिल नहीं किया गया है। सरकार का यह फैसला चीनी के उपयोग को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने से रोकने और चीनी की उपलब्धता बनाए रखते हुए खाद्य महंगाई पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से लिया गया है। गन्ने से बनने वाले इथेनॉल के कुछ विकल्पों पर रोक लगने के कारण, तेल कंपनियों को इथेनॉल की अपनी जरूरत पूरी करने के लिए मक्का और सी-हैवी मोलासेस जैसे अन्य विकल्पों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।
इससे तेल कंपनियों की खरीद लागत बढ़ने की आशंका है, क्योंकि मक्का आधारित इथेनॉल की खरीद कीमत 68.86 रुपए प्रति लीटर है, जबकि बी-हैवी मोलासेस से बनने वाले इथेनॉल की कीमत 60.73 रुपए प्रति लीटर बताई गई है। इस प्रकार, मक्का आधारित इथेनॉल बी-हैवी मोलासेस वाले इथेनॉल से लगभग 13.4 प्रतिशत महंगा है। इथेनॉल बनाने में मक्का का इस्तेमाल बढ़ने से पोल्ट्री उद्योग की लागत पर सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि मक्का मुर्गियों के चारे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। देश में पैदा होने वाले कुल घरेलू मक्के का लगभग 55-60 प्रतिशत हिस्सा पोल्ट्री उद्योग द्वारा ही इस्तेमाल किया जाता है। अगर मक्के की एक बड़ी मात्रा इथेनॉल बनाने में उपयोग की जाने लगी, तो पशु-पक्षियों के चारे की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अंततः अंडे और चिकन की कीमतों पर देखने को मिल सकता है। हालांकि, कीमतें कितनी बढ़ेंगी, यह मक्के की उपलब्धता और बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा, लेकिन जानकारों के अनुसार, इसका सीधा प्रभाव आम उपभोक्ता की थाली पर पड़ना तय है।


