रांची: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर झारखंड की पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान समुराय टेटे ने अपने संघर्ष, उपलब्धियों और आने वाली पीढ़ी की बेटियों के लिए संदेश साझा किया। सिमडेगा के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाली सुमराय टेटे आज देश की प्रेरणादायक खिलाड़ियों में गिनी जाती हैं। खेल के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान के लिए उन्हें ध्यान चंद लाइफटाइम एचीवमेंट अॅवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। सुमराय टेटे का जन्म झारखंड के सिमडेगा जिले के कसिरा मेरोंगटोली गांव में एक साधारण आदिवासी परिवार में हुआ। बचपन में गांव में न खेल की सुविधाएं थीं और न ही हॉकी का आधुनिक सामान। सुमराय बताती हैं कि उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में बांस की लकड़ी और चमड़े की गेंद से हॉकी खेलना शुरू किया। वे कहती हैं, कि हमारे गांव में हॉकी स्टिक तक उपलब्ध नहीं थी, लेकिन खेल के प्रति लगाव इतना था कि जो भी साधन मिला, उसी से अभ्यास शुरू कर दिया। सुमराय टेटे बताती हैं कि उनके चाचा सिमोन टेटे हॉकी खेलते थे। उन्हें देखकर ही उनके मन में हॉकी खेलने की प्रेरणा जगी। स्कूल के कोचों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। 1990 में रांची के बरियातू गर्ल्स हॉकी सेंटर में उनका चयन हुआ, जहां से उनके पेशेवर करियर की शुरुआत हुई। उस समय उन्हें लगभग 1200 रुपये की छात्रवृत्ति मिलती थी, लेकिन उससे खर्च चलाना आसान नहीं था। उनके पिता हर महीने 500 रुपये भेजते थे, जो उनके लिए बहुत बड़ी मदद थी। लगातार मेहनत और बेहतर प्रदर्शन के दम पर सुमराय टेटे ने भारतीय महिला हॉकी टीम में जगह बनाई और बाद में टीम की कप्तान भी बनीं। इस तरह वह झारखंड की पहली महिला खिलाड़ी बनीं जिन्होंने भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी की। वे कहती हैं कि भारतीय टीम की कप्तानी करना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान रहा। यह मेरे लिए ही नहीं बल्कि झारखंड के लिए भी गर्व की बात थी। सुमराय कहती हैं कि कॉमनवेल्थ गेम्स की वह जीत मेरे जीवन की सबसे यादगार उपलब्धि है। उस जीत ने भारतीय महिला हॉकी को नई पहचान दी। खेल से संन्यास के बाद भी सुमराय टेटे हॉकी से जुड़ी हुई हैं। वह दक्षिण-पूर्वी रेलवे महिला हॉकी टीम की कोच हैं और युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे रही हैं। महिला दिवस के मौके पर वह बेटियों को संदेश देते हुए कहती है कि अगर मेहनत और आत्मविश्वास हो तो कोई भी सपना बड़ा नहीं होता। बेटियों को खेल और शिक्षा दोनों में आगे बढ़ना चाहिए।
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