नई दिल्ली । देश में प्याज के दाम फिर 50 से 60 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गए हैं, जिसने अतीत में कई बार सरकारों को असहज किया है। 1998 में प्याज की महंगाई पर लिखा भोजपुरी गीत अब का सलाद खईबस पियजिया अनार हो गईल… उस दौर में खूब चर्चा में आया था। तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा सरकार थी और प्याज ने ऐसा रुलाया था कि भाजपा को कई साल तक सत्ता से बाहर रहना पड़ा। यह घटनाक्रम केवल एक बार का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के इतिहास में प्याज ने कई बार सत्ता के समीकरणों को बदला है।
भारत के राजनीतिक इतिहास में प्याज का पहला बड़ा सियासी असर 1977 में दिखा। आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को बड़ी हार मिली और जनता पार्टी सत्ता में आई। हालांकि, आंतरिक कलह और आर्थिक चुनौतियों के बीच जब प्याज के दाम 5 रुपये प्रति किलो के पार गए, तब यह उस दौर के हिसाब से बेहद अधिक था। तत्कालीन कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी ने जनता के असंतोष को भांप लिया और अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाया। रैलियों में प्याज की माला पहनकर उन्होंने सवाल उठाया कि जो सरकार आम नागरिक को प्याज न दे सके, उसकी क्या जरूरत। 1980 के आम चुनाव में कांग्रेस ने प्याज की सस्ती दरों का वादा किया और प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। यह घटना केवल देश में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियों में रही। विदेशी मीडिया ने इस इंदिरा गांधी की जीत से प्याज की दरों में गिरावट शीर्षक से विश्लेषित करते हुए लिखा था कि भारत में प्याज कोई साधारण खाद्य सामग्री नहीं, बल्कि एक अत्यधिक संवेदनशील राजनीतिक विषय है, जिसके बिना भारतीय रसोई की कल्पना मुश्किल है।
इतिहास ने 1998 में खुद को दोहराया। दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्याज के दाम 50-60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए। बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए भाजपा ने भले ही चुनाव से 52 दिन पहले सुषमा स्वराज को दिल्ली की कमान सौंपी, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। विपक्ष ने प्याज को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया और नतीजतन, भाजपा को दिल्ली में हार मिली, कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। इसी साल राजस्थान में भी प्याज की मार पड़ी और तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत को सत्ता से बाहर होना पड़ा। उन्होंने माना था कि प्याज की कीमतों ने उनके चुनावी गणित को बिगाड़ दिया। 1998 में ही महाराष्ट्र में दिवाली के आसपास प्याज की किल्लत के बीच कांग्रेस नेता छगन भुजबल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को मिठाई के डिब्बे में प्याज भेंटकर अनोखा विरोध दर्ज कराया था। इसके बाद राज्य सरकार को रियायती दरों पर प्याज उपलब्ध कराना पड़ा।
साल 2010 में मौसम की मार ने प्याज की खेती को भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में फसलें बर्बाद हो गईं। दिसंबर में दिल्ली में प्याज की कीमत एक सप्ताह में 35 रुपये से 80 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। केंद्र सरकार ने तुरंत प्याज के निर्यात पर रोक लगाई, आयात शुल्क घटाया और पड़ोसी देश पाकिस्तान से आपातकालीन व्यवस्था के तहत प्याज मंगवाया, जिससे कीमतें कुछ नियंत्रित हो सकीं। जिस प्याज के मुद्दे पर 1998 में कांग्रेस दिल्ली की सत्ता में आई थी, वही 2013 में उसकी विदाई का कारण बना। 15 सालों से मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित की सरकार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले प्याज के आसमान छूते दामों पर विपक्षी हमलों का सामना कर रही थी। हालांकि उन्होंने यह बयान भी दिया कि बढ़ती दरों के कारण उन्होंने भिंडी के साथ प्याज खाना कम कर दिया है, लेकिन जनता ने इसे स्वीकार नहीं किया और कांग्रेस 15 साल बाद सत्ता से बाहर हो गई। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि भारत में प्याज केवल एक सब्जी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक थर्मामीटर है, जिसके दाम बढ़ते ही सत्ता का सियासी मिजाज बिगड़ जाता है।


